Headlines

दया, रहम और करुणा की बात करने वाला इस्लाम जानवरों की क़ुरबानी का हुक्म कियों देता है

Posted by Indian Muslim Observer | 25 October 2010 | Posted in

सलमान अहमद

हजरत मुहम्मद ने कहा, जिसके मन में दयाभाव नहीं, वह अच्छा मनुष्य नहीं हो सकता। इसलिए दया और सहानुभूति एक सच्चे मुसलमान के लिए जरूरी है। इस्लाम में जमीन पर रेंगने वाली चींटी की भी अकारण हत्या करने को पाप बताया गया है।

हजरत मुहम्मद ने सचमुच लोगों को प्रेम और शांति से जीना सिखाया। अगर इस्लाम के दर्शन का गहन अध्ययन किया जाए तो इसकी बुनियाद में दया और करुणा नजर आती है। हजरत मुहम्मद ने स्पष्ट किया है, तुम इस पृथ्वी के सभी जीव-जंतुओं पर दया करो, परमात्मा तुम पर दया करेगा। तस्वीर साफ है कि इस्लाम मनुष्यों के साथ-साथ समस्त जीव- जंतुओं के लिए भी दया का पाठ पढ़ाता है।

लेकिन सवाल उठता है कि जब इस्लाम जीव- जंतुओं के साथ दया और रहम की बात कहता है, तो फिर मुसलमान पशुओं की हत्या कर उनका मांस क्यों खाते हैं? वे भी जैनियों और बौद्धों की तरह शाकाहार को क्यों नहीं अपना लेते, ताकि उन जीवों को भी जीवित रहने का अधिकार मिले।

इस्लाम के मुताबिक किसी भी मुसलमान के लिए यह जरूरी नहीं कि वह मांस खाए। अगर कोई व्यक्ति अपनी इच्छा से शाकाहार ग्रहण करता है तो कोई हर्ज नहीं, वह मुसलमान बना रहेगा, इस्लाम से बाहर नहीं हो जाएगा।

लेकिन इसी के साथ इस्लाम यह भी मानता है कि इंसान शुरू से ही मांसाहार और शाकाहार कर रहा है। अल्लाह ने करोड़ों- खरबों मछलियां, पक्षी, भेड़- बकरियां, ऊंट- घोड़े सब किसी न किसी काम के लिए ही पैदा किए हैं। जहां ये हमें दूध, अंडे, फर और चमड़ा देते हैं, वहीं आहार भी देते हैं। इनका उचित उपयोग नहीं होने से पर्यावरण का संतुलन नष्ट हो जाएगा।

इस्लाम के मुताबिक मनुष्यों की एक बहुत बड़ी आबादी को आहार के लिए अन्न और फल की जगह यही उपलब्ध है। एस्कीमो और सागर तटों पर रहने वाली सैकड़ों जातियों का भोजन ही मछली और दूसरे जलचर हैं। कई इलाके तो ऐसे हैं जहां कोई शाक- सब्जी पैदा नहीं होती और लोगों को जिंदा रहने के लिए जानवरों के मांस, हड्डी, फर और चिकनाई पर ही गुजारा करना पड़ता है। इसी प्रकार अरब के मरुस्थल में ऊंट और बकरी से दूध और मांस के साथ-साथ तंबुओं और जूतों के लिए चमड़ा भी प्राप्त किया जाता था। अरबों की अर्थव्यवस्था पूर्ण रूप से इन्हीं पशुओं पर निर्भर थी।

इसलिए इस्लाम जरूरत के हिसाब से इंतजाम की मनाही नहीं करता, लेकिन वह क्रूर व्यवहार का सख्त विरोध करता है। इस्लाम किसी भी जीव को जिंदा आग में जलाने, मनोरंजन के लिए हत्या करने, उन पर जरूरत से अधिक बोझ डालने, दूध पिलाने वाली मादा की हत्या करने, पक्षियों के अंडे या घोंसले तोड़ने या किसी जीव को तड़पा-तड़पा कर मारने को धर्म विरोधी कार्य मानता है।

इस्लाम, अहिंसा और पशु-पक्षी से प्रेम

Posted by Indian Muslim Observer | | Posted in

प्रदीप शर्मा 

पंद्रह सौ वर्ष पूर्व अरब के रेगिस्तान से एक काफिला गुजर रहा था। काफिले के सरदार ने एक उचित स्थान देख कर रात में पड़ाव डालने का फैसला किया। काफिले वालों ने अपना-अपना सामान ऊँटों पर से उतारा। कुछ देर आराम करके उन्होंने नमाज पढ़ी और खाना बनाने के लिए झाड़ियां और सूखी लकडि़याँ इकट्ठी करने लगे। थोड़ी देर में ही रेगिस्तान के इस भाग में दर्जनों चूल्हे रोशन हो गए।

कबीले के सरदार एक चूल्हे के पास पड़े पत्थर पर आकर बैठ गए और जलती हुई आग को देखने लगे। तभी उन्होंने देखा कि चूल्हे के बराबर में चींटियों का बिल है और आग की गर्मी से वे व्याकुल हो रही हैं। कुछ चींटियां बिल में जाने के लिए चूल्हे के आस-पास जमा हैं और कोई उचित रास्ता तलाश कर रही हैं।

सरदार से चींटियों की यह परेशानी न देखी गई। वह अपने स्थान से उठे और चीख कर बोले, आग बुझाओ, आग बुझाओ। उनके साथियों ने कोई प्रश्न किए बग़ैर तुरंत आग बुझा दी। सरदार ने जल्दी से पानी डालकर चूल्हे के स्थान को ठंडा किया। उनके साथी खाना बनाने का सामान समेटकर दूसरे स्थान पर चले गए। काफिले के ये सरदार थे हजरत मुहम्मद (सल्ल0)।

सहाबी जाबिर बिन अब्दुल्ला कहते हैं, एक बार ह. मुहम्मद के पास से एक गधा गुजरा जिसके चेहरे को दागा गया था और उसके नथुनों से खून बह रहा था। हुजूर को गधे को दुख देखकर बड़ा क्रोध आया और आपने कहा, उस पर धिक्कार जिसने यह हरकत की। आपने घोषणा करा दी कि न तो पशुओं के चेहरे को दागा जाए, ना ही चेहरे पर मारा जाए।

याहया इब्ने ने लिखा है, एक दिन मैं हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के पास बैठा हुआ था कि एक ऊँट दौड़ता हुआ आया और घुटने टेक कर आपके सामने बैठ गया। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने मुझसे कहा, जाओ देखो, यह किसका ऊँट है। इसके साथ क्या हुआ है?

मैं उस ऊँट के मालिक की तलाश में निकला और उसे बुलाकर हजरत मुहम्मद (सल्ल0) के पास ले आया। आपने उससे पूछा, यह तुम्हारे ऊँट का क्या हाल है? उसने उत्तर दिया मुझे पता नहीं। हम इससे पहले काम लेते थे, खजूर के बागों में इस पर लादकर पानी दिया करते थे। अब यह बूढ़ा हो चला है, काम के लायक नहीं रहा। इसलिए कल रात ही मशविरा किया कि इसे काटकर इसका गोश्त बाँट देते हैं।

आपने कहा, इसे काटो मत, या तो मुझे बेच दो या मुफ्त दे दो। वह सहाबी बोले, आप इसे बगैर कीमत के ही ले लें। आपने उस ऊँट पर सरकारी निशान लगाकर उसे सरकारी जानवरों में शामिल कर लिया।

एक बार सहाबी अब्दुल्ला बिन उमर ने देखा, कुछ लड़के एक चिडि़या को बाँधकर निशाना लगा रहे थे। उमर को देख कर वे इधर-उधर भाग गए। तब सहाबी अब्दुल्ला बिन उमर ने कहा, उस व्यक्ति के लिए धिक्कार है जो किसी जीव को निशाना बनाए। हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने फ़रमाया है, अगर कोई व्यक्ति किसी गौरैया को बेकार मारेगा तो कयामत के दिन वह अल्लाह से फरियाद करेगी कि ऐ रब, इसने मुझे क़त्ल किया था।

हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने जानवरों से उनकी शक्ति से अधिक काम लेने और उन्हें भूखा-प्यासा रखने से भी मना किया है। एक बार हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने देखा कि एक काफिला कहीं जाने की तैयारी कर रहा था। एक ऊँट पर इतना बोझ लाद दिया गया था कि उसके भार से वह व्याकुल हो गया। आपकी नजर उस पर पड़ी तो आपने तुरंत उसका बोझ कम करने को कहा। इन तारीखी हक़ीक़तों से पता चलता है कि इस्लाम में मनोरंजन के लिए किसी जीव की हत्या करना पाप है। हजरत मुहम्मद (सल्ल0) ने नन्हीं सी चींटी, धरती पर रेंगने वाले जानवरों, बेजुबान पक्षियों और पशुओं -सभी पर दया करने को कहा है। अब सवाल ये पैदा होता है के किया इस्लाम किसकी इंसान को नुकसान पुहुचाने की इजाज़त दे सकता है । इस्लाम को आतंकबाद का धर्म कहने वालों को अपनी मानसिकता बदलने की ज़रोरत है।

टोनी ब्लेयर की साली ने इस्लाम धर्म अपनाया, इस्लाम के उसोलों पर पूरी तरह कर रही हैं अमल

Posted by Indian Muslim Observer | | Posted in

25 Oct 2010, एजेंसियां

लंदन ।। ब्रिटेन के पीएम रह चुके टोनी ब्लेयर की साली लॉरेन बूथ ने खुलासा किया है कि उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया है। टोनी ब्लेयर की पत्नी चेरी ब्लेयर की बहन बूथ जन्म से कैथलिक हैं। हाल ही में ईरान की यात्रा से लौटने के बाद बूथ ने यह फैसला किया। वह ह्यूमन राइट्स कैंपेनर तो हैं ही साथ ही जर्नलिस्ट भी हैं और ईरान के इंग्लिश चैनल प्रेस टीवी के लिए काम भी करती हैं।

हाल ही में एक इस्लामिक रैली में बूथ भी नजर आईं, जिसके बाद उनके इस्लाम धर्म अपनाने की बात सामने आई। 43 साल की बूथ ने मीडिया को बताया, छह हफ्ते पहले मुझे ईरान स्थित एक मजार में अनोखा अनुभव हुआ। अब मैं दिन में पांच बार नमाज अदा करती हूं, कुरान पढ़ती हूं और अक्सर मस्जिद जाती हूं। पिछले डेढ़ महीने से मैंने शराब और सूअर के मीट को हाथ तक नहीं लगाया है। वह घर से बाहर निकलने पर सिर को हिजाब से ढकती हैं और कहती हैं कि अब में बुरका भी पह्नोंगी ।

कन्वर्ट होने की बात पर विवाद होना तय है, वह यह मानती हैं। हाल ही में बूथ ने अपने जीजा टोनी ब्लेयर पर मिडल ईस्ट में बतौर दूत के भेदभाव करने का आरोप लगाया था। वह कहती हैं कि मेरे जीजा मुसलमानों के प्रति अच्छा नजरिया नहीं रखते इसलिए वह कभी फलस्तीन और इस्त्राइल के बीच बैलेंस नहीं बना पाएंगे।

हिंदुस्तान में अल्पसंख्यकों की दशा और मुस्लिम युवाओं के आगे बढ़ते क़दम

Posted by Indian Muslim Observer | 24 October 2010 | Posted in

सलमान अहमद

आज़ादी के बाद से हिंदुस्तान के सफ़र को देखता हूँ तो पाता हूँ कि जहाँ अल्पसंख्यक आज से 60 बरस पहले खड़े थे, आज भी कमोवेश वहीं पर हैं.

उसी ग़ैर-बराबरी और ग़ैर-अमनी के माहौल में आज के हिंदुस्तान का अल्पसंख्यक युवा भी साँस ले रहा है.

विभाजन के समय से ही हिन्दुस्तानी मुसलमान तरह तरह की परिशानियों में फंसा हुआ है. कुछ लोग यह समझते रहे हैं कि मुल्क को बाँटने में मुसलमानों का बड़ा हाथ रहा है. हमेशा मुसलमानों को शक की निगाह से देखा जाता रहा है.

हुक़ूमतों की ओर से भी मुसलमानों की उपेक्षा ही होती रही है. ज़बानी बयानों और कोरे सब्ज़-बागों के सहारे अल्पसंख्यकों को वोटों की राजनीति के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा.

आज भी तक़रीबन वही हाल है. हालांकि हर तबके का आम आदमी भी अब इस बात को समझ रहा है कि अल्पसंख्यकों की उपेक्षा हुई है लेकिन किसी न किसी वजह से लोग खुल कर बोलने को तैयार नहीं है.

मुसलमानों को जो राहतें भी थोड़ी बहुत मिली वो भी क़ानूनी पचड़ों में पड़कर कागज़ी ही होकर रह गई हैं.

दरअसल, मुल्क में मुसलमानों की इतनी ख़राब स्थिति पैदा ही न होती अगर इन्हें मुसलमान की हैसियत से देखने के बजाय एक हिंदुस्तानी की हैसियत से देखा गया होता.

सिख और ईसाई अल्पसंख्यक

देश के बँटवारे ने सिख समुदाय के लोगों की सोच और दिलो-दिमाग पर भी गहरा असर डाला था जिसकी वजह से वोह काफी समय तक प्रभावित होते रहे.

आज़ादी के कई दशकों बाद सिखों में अलगाववाद और पंजाब में चरमपंथ की आग का असर यह रहा कि इस समुदाय को पूरे देश में बुरी तरह प्रभावित किया गया. पलटकर देखें तो 1984 के सिख विरोधी दंगों के घाव तो आज तक नहीं भरे हैं. लेकिन मुसलमानों के बरखेलाफ सिख समुदाय अब बिलकुल ही तर्रक्की के ट्रेक पर है.

ईसाइयों की बात करें तो देश की आज़ादी के बाद ईसाई बाक़ी अल्पसंख्यकों की तरह निशाना नहीं बने. इनके साथ कोई बडा संकट कभी नहीं रहा और यह कौम हमेशा से ही आत्मनिर्भर रही है.

देशभर में फैले मिशनरी स्कूलों की बदौलत अच्छी शिक्षा हमेशा से उनकी पहुँच में रही है.

बदलती स्थितियाँ

दूसरी ओर मुसलमानों को भी अब यह बात समझ में आने लगी है के उनकी अशिक्षा और ग़रीबी ही उनके पिछड़ेपण की असल वजह है. इसीलिए मुसलमानों ने भी शिक्षा और तकनीक की ओर अपना ध्यान बढ़ाया है.
अच्छी बात यह है कि आज का मुसलमान युवा पिछली पीढ़ियों से ज़्यादा समझदार है.

यही वजह है कि आज के मुस्लिम युवा मुख्यधारा में शामिल होने के लिए मेहनत कर रहे हैं और बहुत हद तक क़ामयाब भी हो रहे हैं. मुस्लिम युवाओं की मिहनत और लगन को देख कर ऐसा लग रहा है के बहुत जल्द इस कौम की तकदीर का सितारा चमकने वाला है.

अब ज़रूरत इस बात की है कि इसके लिए बाक़ी समाज को सकारात्मक होकर सामने आना होगा.

अयोध्या फ़ैसले पर प्रशांत भूषण

Posted by Indian Muslim Observer | 23 October 2010 | Posted in

बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि मामले में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फ़ैसला न केवल न्यायिक दृष्टि से अस्वस्थ तथा असंतुलित है बल्कि राष्ट्र के धर्मनिर्पेक्ष ताने-बाने को भी बाधित करने वाला है। फ़ैसले में न्यायिक त्रुटियाँ पूरी तरह मौजूद हैं। अदालत ने सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड द्वारा दायर 1961 की अर्ज़ी को हदबंदी के आधार पर ख़ारिज कर दिया, लेकिन बाल भगवान, राम लला द्वारा दायर 1989 की अर्ज़ी को समय के साथ बरक़रार रखा। 2 जजों (अग्रवाल और शर्मा) का कहना है कि वह यह नहीं कह सकते कि बाबरी मस्जिद का निर्माण कब किया गया और किसने किया। लेकिन इसके साथ ही वह यह कह सकते हैं कि बाबरी मस्जिद मंदिर ध्वस्त करके निर्माण की गई। जस्टिस शर्मा ने यह माना कि बाबरी मस्जिद के स्थान पर विशाल मंदिर था और यही राम के पिता दशरथ का महल था। उनके लिए एएसआई की 1988 की रिपोर्ट भी आश्चर्यजनक है जिसमें यह कहा गया है कि दो हज़ार वर्ष से पूर्व अयोध्या में मानव कंकालों का वजूद नहीं था और राम का जन्म यह बताता है कि लाखों वर्ष पूर्व उन्होंने अपना स्थान बनाया। यहां तक कि पुराने मंदिर की मौजूदगी एएसआई की 2003 की रिपोर्ट के आधार पर मान ली गई, जिसमें इसका कोई ब्योरा नहीं है कि मस्जिद का निर्माण मंदिर ध्वस्त करके किया गया। बल्कि इसमें यह कहा गया है कि मस्जिद के नीचे हिंदू मंदिर के अवशेष और मल्बे मिले हैं। सर्वे रिपोर्ट में इसका कोई विवरण नहीं है और न ही उसने इस सच को स्वीकार किया है कि मस्जिद की भूमि के नीचे मिलने वाले मलबे से उसकी पुष्टि होती है कि मस्जिद का निर्माण मंदिर ध्वस्त करके किया गया। मस्जिद के नीचे मलबे में पशुओं की अस्थियां भी मिलीं जिस पर गारा चूना इत्यादि भी हिंदुओं के मंदिर को नकारता है उसी प्रकार मस्जिद के निर्माण की पुष्टि करता है।

सबसे अधिक चैंकाने वाली बात यह है कि फ़ैसले में बाबरी मस्जिद के गंुबद वाली ज़मीन पर राम लला के स्वामित्व को मान लिया (जिसका अर्थ है कि वीएचपी गार्जियन है) इसलिए कि जजों ने हिंदुओं को यह अधिकार दे दिया कि गंुबद के नीचे राम के जन्म स्थान पर धार्मिक प्रार्थना करे। जजों ने यह निष्कर्ष कैसे निकाल लिया कि गुंबद के नीचे राम का जन्म स्थान है। क्या सर्वे रिपोर्ट हिंदुओं की इस कल्पना का समर्थन करती है? हम यह नहीं मान सकते हैं कि हिंदुओं की अक्सरियत इसको स्वीकार करेगी। दरअसल हिंदू 1955 से मस्जिद परिसर में धार्मिक प्रार्थनाएं करते आए हैं।

यह इतिहास इसके विरुद्ध है कि 1949 में मस्जिद के गंुबद के नीचे राम लला पैदा हुए। इसके बावजूद दिसम्बर 1949 में गंुबद के नीचे श्री राम की मूर्ति रख दी गई। फिर राम जन्म भूमि लिब्रेशन मूवमेंट हिंदुओं से सहयोग के लिए सामने आया। इस आंदोलन से राम के नाम पर अधिकतर वह लोग जुड़े जिनके अंदर कट्टरता तथा धार्मिक उनमाद पाया जाता था और मुस्लिम शासकों के प्रति प्रतिशोध की भावना काम कर रही थी, लेकिन क्या राम के उस स्थान पर जन्म के बारे में हिंदुओं की आस्था होना काफ़ी है। अगर ऐसा हो भी जाए तो क़ानूनी आधार पर ‘राम लला और उनके गार्जियन वीएचपी’ को विवादित भूमि नहीं दी जा सकती है। किसी की आस्था के आधार पर विवादित सम्पत्ति का विभाजन किया जा सकता है, अगर ऐसा होता है तो यह बहुत ही ख़तरनाक है। विशेषरूप से हमारे देश के भीतर जहां विभिन्न धर्मों के लोग रहते हैं। अगर देश में धार्मिक कट्टरता और साम्प्रदायिकता इसी तरह स्थान पाती रही तो बहुसंख्यक वर्ग, बलवान लोग निर्बलों की सम्पत्तियों तथा जायदादों पर आस्था को आधार बनाकर क़ब्ज़ा करते रहेंगे। क्या यह फ़ैसला ऐसा नहीं है कि जिसमें बहुसंख्यकों का ध्यान रखते हुए तथा अल्पसंख्यक वर्ग को दलित तथा आदिवासी मानते हुए किया गया। जैसा कि बृहमणवादियों के समय में हुआ करता था।

फ़ैसले का एक भाग क्या समझौते का आधार बन सकता है। फ़ैसले के उस भाग में जिसमें यह कहा गया है कि हिंदू-मुस्लिम दोनों 1955 से ही विवादित स्थल पर धार्मिक प्रार्थनाएं करते आए हैं क्या एक परिसर में संयुक्त रूप से दोनों समुदायों के लोग पूजा कर सकते हैं? तो दोनों समुदाय के लोगों को संयुक्त रूप से भूमि विभाजित कर दी जाए। लेकिन राम लला के जन्म स्थान को राम जन्म भूमि लिब्रेशन मूवमेंट के मद्दे नज़र राम लला को दे दी जाए, इस प्रकार का फ़ैसला क़ानून और शिष्टाचार की दृष्टि में चिंताजनक है, जिससे धार्मिक उनमाद को सर उभारने का अवसर मिलेगा और वह मुस्लिम विरोधी भावनाओं के तहत उनके अन्य पूजा स्थलों पर भी क़ब्ज़े की कोशिश करेंगे और फिर मामला न्यायालय में जाएगा और फ़ैसला आस्था के आधार पर उनके पक्ष में दे दिया जाएगा।

कुछ समझदार लोग यह कह रहे हैं कि मुसलमानों को इस फ़ैसले को स्वीकार कर लेना चाहिए। शायद उन्हें यह मालूम नहीं कि यह एक चापलूसी है और इससे धार्मिक उनमाद और साम्प्रदायिकता उसे एक विजय के रूप में लेगी और आगे भी अन्य पूजा स्थलों पर क़ब्ज़े के लिए मार्ग प्रशस्त कर लेगी। फासीवादी शक्तियों की मँुह भराई करके अन्याय की क़ीमत पर शांति नहीं ख़रीदी जा सकती। क्योंकि वह बहुत अधिक समय तक क़ायम नहीं रह सकती। हमें यह याद रखना चाहिए कि इतिहास का एक पार्ट उदाहरण बन जाता है। कुछ पश्चिमी देशों का प्रयास हिटलर के रास्ते में विफल हुआ यह मामला भी इसी के समान है। इसलिए हम यह महसूस करते हैं कि इस फ़ैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय का फ़ैसला सभी समुदाय के लोगों के लिए स्वीकारीय होगा। हम यह भी समझते हैं कि अगर सर्वोच्च न्यायालय फ़ैसले में संशोधन करके सुन्नी वक़्फ़ बोर्ड को उसकी भूमि सुपुर्द करेगा तो यह भाईचारे का संकेत होगा जिसमें भूमि मस्जिद की होगी और साइड में मंदिर होगा। यहां भूमि का महत्व नहीं है बल्कि सिद्धांत का महत्व है। क्या हमारा देश धर्मनिर्पेक्ष कानून द्वारा चलाया जाएगा अथवा आस्था और अराजकता द्वारा। यह ऐसा मामला है जिसमें सब परेशान हैं।

अयोध्या फ़ैसले पर वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव

Posted by Indian Muslim Observer | 19 October 2010 | Posted in

आपका दोस्त इस घड़ी में भी फच्चर लगाने से बाज नहीं आया.” शिकायत मेरे बारे में थी और मुझे ही सुनाई जा रही थी. संदर्भ 30 सितंबर की शाम का था.
 

टीवी में सभी न्यूज़ चैनलों पर लखनऊ उच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत हो रहा था, बीती को भुलाकर अब आगे बढ़ने का आह्वान हो रहा था.
 

लेकिन मुझ जैसे कुछ लोग “मैं न मानूं” का राग अलाप कर टीवी स्टूडियो का माहौल बिगाड़ने पर तुले थे. मेरे दोस्त का आस्थावान रिश्तेदार उन्हें फोन कर पूछ रहा था कि मेरे जैसे लोग रंग में भंग क्यों करते हैं.
 

मैं पलटवार कर सकता था. याद दिला सकता था कि रथयात्रा के दौरान यही आडवाणी जी कहते थे कि आस्था का मामला किसी भी कोर्ट कचहरी से ऊपर है. पूछ सकता था कि न्यायालय के निर्णय के प्रति इतनी श्रद्धा कब से पैदा हुई?
 

कहाँ गई थी यह श्रद्धा 6 दिसंबर, 1992 को, जब सर्वोच्च न्यायालय के आदेश की धज्जियाँ उड़ाई जा रही थीं? फिर मैंने सोचा कि दूसरे जो भी करें, कम से कम मेरे जैसे लोगों को तो कोर्ट कचहरी का सम्मान करना चाहिए.
 

कई सवाल
 

मैं कई क़ानूनी तर्क गिना सकता था. पिछले दस दिनों में पूर्व-जज राजिंदर सच्चर और अहमदी और राजीव धवन, प्रशांत भूषण और नूरानी साहब जैसे क़ानूनविदों ने तमाम सवाल पूछे हैं, जिनका कोई जवाब उच्च न्यायालय के फ़ैसले में नहीं है.
 

मिल्कियत का फ़ैसला करने के बजाय संपत्ति के बंटवारे की बात कहाँ से आई? अगर वक्फ़ बोर्ड का दावा ग़लत है तो उन्हें एक-तिहाई हिस्सा भी क्यों दिया गया? उच्च न्यायालय इतिहास के उस सवाल में गया ही क्यों जिसका जवाब देने से सर्वोच्च न्यायालय ने तौबा कर ली थी?
 

आस्था का एहसास यकायक मिल्कियत का दावा कैसे बन जाता है? क्या अबसे यह छलांग लगाने की इजाज़त सबको मिलेगी? या कोर्ट कचहरी यह सुविधा उन्हीं को देगी जिनके पीछे लाखों की भीड़ हो जिनके हाथों में त्रिशूल हो और जिनके माथे पर तिलक हो?
 

अयोध्या विवाद ने इस देश का मन तोड़ा है. लाखों-करोड़ों हिन्दुओं और मुसलमानों के मन में जहर घोला है, बैर के बीज बोए हैं. ऐसे गहरे जख्म ऊपरी पोचा-पट्टी से भर नहीं जायेंगे.
 

इस बीच पिताजी का फोन आता है. मैं उन्हें यह सब क़ानूनी तर्क तफ़सील से समझाता हूँ.
 

जीवन भर ‘न हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा’ के सेकुलर विचार में आस्था रखने वाले पिताजी आख़िर में कहते हैं: “बेटा, हो सकता है, क़ानूनी हिसाब से ये फ़ैसला सही न हो. लेकिन किसी को तो इस झगड़े को ख़त्म करना था. कोर्ट ने कम-से-कम एक रास्ता तो दिखाया है. अब बस हिंदू-मुसलमान इसे मान लें और झगड़े को ख़त्म करें. अब ध्यान इसपर दें कि आगे से ऐसा फसाद इस देश में फिर से कभी न हो.”
 

राहत की बात
 

उनकी बात से मुझे वो शिकायत समझ आई जिसका जिक्र शुरू में किया गया है. सच यह है कि अयोध्या विवाद पर उच्च न्यायालय के फ़ैसले के बाद से आम लोगों ने राहत की सांस ली है.
 

हिंदुओं और मुसलमानों का बहुमत आज ये चाहता है कि इस फ़ैसले की ज्यादा चीर-फाड़ न की जाए. अगर कुछ तकनीकी गड़बड़ी है भी तो उसे ढका रहने दिया जाए. बस अब इस मामले को रफा-दफा किया जाए.
 

दरअसल मुझे इसी मानसिकता से ऐतराज़ है. अयोध्या विवाद ने इस देश का मन तोड़ा है. लाखों-करोड़ों हिंदुओं और मुसलमानों के मन में ज़हर घोला है, बैर के बीज बोए हैं. ऐसे गहरे जख्म ऊपरी पोचा-पट्टी से भर नहीं जाएंगे.
 

समाज के गहरे जख्म को भरने के लिए सच के नश्तर की जरूरत है, ताकि बरसों से पडी मवाद बाहर निकल सके, ताकि दवा और मलहम अपना काम कर सके.
 

आज हम अपना मन भले ही बहला लें कि यह फोड़ा हमारी आँखों से ओझल हो गया है, लेकिन इलाज किए बिना यह फोड़ा नासूर बन सकता है. एक दिन ऐसी शक्ल में फूट सकता है, जो पहले से भी ज्यादा खौफ़नाक हो.
इस सिलसिले में हमें दक्षिण अफ्रीका के ट्रुथ एंड रेकोन्सिलिएशन आयोग के महान अनुभव से सीखने की जरूरत है. समाज के गहरे जख्म को भरने के लिए सच के नश्तर की ज़रूरत है, ताकि बरसों से पड़ी मवाद बाहर निकल सके, ताकि दवा और मल्हम अपना काम कर सके.
 

अयोध्या विवाद से टूटे दिलों को जोड़ना है तो सबसे पहले सच बोलने की हिम्मत करनी होगी.
 

सच क्या है
 

सच यह है कि जहाँ आज रामलला विराजमान हैं वहां सैंकड़ों वर्षों से एक मस्जिद थी. यह भी सच है कि बहुत लंबे अरसे से वहां के हिंदुओं की आस्था रही है कि वह राम जन्मभूमि है.
 

इस पुराने झगड़े का हिंदू-मुसलमानों ने अपने तरीके से हल निकाल रखा था. गुम्बद में मुसलमान नमाज़ अदा करते थे तो चबूतरे पर हिंदू आरती करते थे.
 

सच का सबसे कड़वा पहलू यह है कि विभाजन के बाद से कम से कम तीन बार (पहले 1949 में, फिर 1986 और अंत में 1992 में) प्रशासन की मिलीभगत का फायदा उठा कर हिंदू नेताओं ने क़दम-दर-क़दम मुसलमानों को वहां से बेदखल कर दिया.
 

न्याय के मंदिर में ठगा महसूस कर रहे मुसलमानों से आज उदारता की मांग करना बेमानी है. इसलिए अब सर्वोच्च न्यायालय के पास जाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है.
 

सरकार की नाक के नीचे एक विवादित मस्जिद को धक्के से मंदिर में बदल दिया गया. इस जोर-जबरदस्ती से अल्पसंख्यक समुदाय को बचाने के बजाए कोर्ट-कचहरी ने भी इस पर मोहर लगा दी.
 

बहुसंख्यक समाज की धार्मिक आस्था को बचाने के लिए क़ानून, संविधान और देश में आस्था को दांव पर लगा दिया गया. इस सच को स्वीकार किए बिना अयोध्या मामले में कोई मध्यस्थता टिकाऊ नहीं हो सकती.
 

आंसू न पोंछने वाला फ़ैसला
 

अयोध्या मसले पर उच्च न्यायालय के फैसले से मेरा असली ऐतराज़ यह नहीं है कि उसका बंटवारा सही नहीं है, या कि उसके कानूनी तर्क नाकाफ़ी हैं. मेरी परेशानी यह है कि सच इस फ़ैसले से गुम हो गया है.
मेरी पीड़ा यह है कि यह फ़ैसला उन आंखों के आंसू नहीं पोंछता जो 6 दिसंबर, 1992 को भीगी थी.
 

न्याय के मंदिर में ठगा महसूस कर रहे मुसलमानों से आज उदारता की मांग करना बेमानी है. इसलिए अब सर्वोच्च न्यायालय के पास जाने के सिवाय कोई रास्ता नहीं है.
 

उम्मीद करनी चाहिए कि न्याय के सबसे ऊंचे पायदान पर सच बोलने में किफ़ायत बरतने की मजबूरी नहीं होगी. मुसलमान को यह भरोसा होगा कि उसे इस देश में किराएदार नहीं समझा जाता.

Donate to Sustain IMO

IMO Search

IMO Visitors

    Archive