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विदेशी तब्लीगी जमाअत के लोगों की रिहाई के लिए इम्पार का गृह सचिव को पत्र

Posted by Indian Muslim Observer | 26 June 2020 | Posted in , , , , ,

मद्रास हाई कोर्ट के आदेश के बाद आने वाली बाधा को गृह मंत्रालय से दूर करने की अपील 

नयी दिल्ली: इंसानी बुनियादों पर विदेशी तबलीगी जमात के लोगों को छोड़ने के लिए भारत सरकार के होम सेक्रेट्री अजय कुमार भल्ला को इंडियन मुस्लिम फॉर प्रोग्रेस एंड रिफॉर्म्स (IMPAR) की ओर से एक पत्र लिखा गया है, जिसमें करोना को लेकर भारत सरकार की कोशिशों की प्रशंसा करते हुए कहा गया है कि भारत सरकार ने अर्थव्यवस्था को बूस्ट करने के लिए जो कदम उठाए हैं वह सराहनीय हैं। साथ ही साथ इस पूरी महामारी में सरकार की ओर से जो कदम आम जनता के हितों की रक्षा में लिए उठाये जा रहे हैं इम्पार उसकी प्रशंसा करता है।  

पत्र में भारत सरकार के गृह सचिव का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा गया है कि चेन्नई तमिलनाडु में फंसी 12 महिलाओं सहित 125 विदेशी तबलीगी जमात के लोगों की रिहाई को लेकर आप से अपील करते हैं। पत्र में कहा गया है कि माननीय न्यायालय द्वारा उनकी रिहाई का आदेश दिया गया है लेकिन राज्य के वरिष्ठ पुलिस और जेल अधिकारियों ने कहा है कि MHA ने इस दिशा में आदेश जारी कर रखा है। जब तक गृह मंत्रालय आदेश वापस नहीं लेता है तब तक यह संभव नहीं है। अहम बात यह है कि उन्होंने किसी भी वीजा की शर्तों का उल्लंघन नहीं किया है या किसी भी ऐसी गतिविधियों में लिप्त नहीं थे जो FIR में उल्लिखित हैं क्यों कि इन्हीं बिंदुओं पर एचसी ने संज्ञान लिया है। 
पत्र में कहा गया है कि अच्छी बात यह है कि देश के किसी भी राज्य में इस तरह का कोई सवाल उत्पन्न नहीं हुआ और तबलीगी जमात के लोगों को न्यायालय से न्याय मिलने के बाद उन्हें उनके देश भेज दिया गया लेकिन चेन्नई तमिलनाडु में जो परेशानी आ रही है उसको लेकर के इम्पार चिंतित है और सरकार से अपील करती है कि सरकार तत्काल प्रभाव से कार्यवाही कर के उनको न्याय दिलाये। इम्पार इस मामले को मानवीय आधार पर उठाते हुये राज्य के अधिकारियों को आवश्यक निर्देश जारी करने के लिए गृह मंत्रालय की ओर देख रहा है, क्योंकि कोविड-19 के अचानक प्रकोप में इनकी थोड़ी सी गलतियों की इनको बड़ी सजा मिल चुकी है। 

इम्पार ने कहा है कि यह बताना उचित होगा कि तब्लीगी जमात के लोग अपनी यात्रा के दौरान या मस्जिदों में रहने के दौरान, किसी भी उपदेशात्मक गतिविधियों में लिप्त नहीं थे, क्योंकि मामले की सुनवाई के दौरान ऐसी कोई रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई थी। किसी की धार्मिक, सांस्कृतिक प्रथाओं के अवलोकन की इस प्रक्रिया को उपदेश के रूप में नहीं माना जा सकता है और न ही उन्हें जारी किए गए वीजा की शर्तों के उल्लंघन का आरोपी बनाया जा सकता है। अहम बात यह है कि मद्रास के माननीय हाई कोर्ट ने व्यक्तिगत सुरक्षा बांड पर ही उनको राहत दी है।  

विदेशों से आजमीने हज अपने फर्ज हज की अदायगी से वंचित

Posted by Indian Muslim Observer | | Posted in , ,

इस वर्ष विश्व के कोने-कोने से लाखों हुज्जाजे कराम हज का तराना अर्थात् लब्बैक पढ़ते हुए मक्का मुकर्रमा नहीं पहुंच पायेंगे

डाक्टर मोहम्मद नजीब कासमी सम्भली

हज के महीनों में शव्वाल का महीना समाप्त होने के बाद जीका'दा महीना के आरम्भ होने पर विश्व में कोरोना वबाई मर्ज के फैलाव के कारण सऊदी हुकूमत ने यह फैसला किया है कि इस वर्ष (2020 - 1441) सऊदी अरब में रहने वाले विभिन्न देशों के नागरिक ही केवल सीमित संख्या में हुज्जाजे कराम की हिफाज़त और सालमीयत के लिए एहतियाती तदाबीर पर अमल करते हुए हजे बैतुल्लाह अदा कर सकेंगे। अर्थात् इस वर्ष विश्व के चप्पे-चप्पे से अल्लाह के मेहमान हज की अदायगी नहीं कर सकेंगे। "हज", नमाज, रोजा और जकात की तरह ही इस्लाम का एक महत्वपूर्ण बुनियादी रुक्न है। सम्पूर्ण जीवन में एक बार प्रत्येक उस व्यक्ति पर हज फर्ज (अनिवार्य) है जिसको अल्लाह ने इतना माल दिया हो कि अपने घर से मक्का मुकर्रमा तक जाने आने पर सक्षम हो और अपने परिवार का भरन पोसन वापसी तक सहन कर सकता हो। अल्लाह तआला का संदेश है: लोगों पर अल्लाह तआला का हक है कि जो उसके घर तक पहुंचने का सामर्थ्य रखते हों वह उसके घर का हज करें और जो व्यक्ति उसके हुक्म को मानने से इंकार करे, उसे मालूम होना चाहिए कि अल्लाह तआला तमाम दुनिया वालों से बेनियाज है। (सूरा आल इमरान - 97)

मार्च के महीने से ऊमरा पर पाबंदी और इस वर्ष विदेशों से हुज्जाजे कराम के हज की अदायगी ना करने पर सऊदी हुकूमत और सऊदी अवाम को अरबों रेयाल का घाटा है। पिछले कुछ वर्षों से करीब 25 - 30 लाख हुज्जाजे कराम हज की अदायगी करते हैं और रमजान के महीने में ऊमरा करने वालों की संख्या उस से भी कहीं अधिक होती है। सऊदी हुकूमत ने कोरोना वबाई मर्ज के कारण देश में लागू पाबंदियां तीन महीने के बाद अब समाप्त कर दी हैं, यहां तक कि खेलों पर लागू पाबंदियां भी 21 जून से उठाली हैं। यद्यपि कि अभी तक मस्जिदे हराम (मक्का मुकर्रमा) आम लोगों के लिए नहीं खोली गई है।

बैतुल्लाह (खाना-ए-काबा) की तामीर के बाद अल्लाह तआला ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को हुक्म दिया: लोगों में हज का ऐलान कर दो कि वो पैदल तुम्हारे पास आएंऔर दूर दराज़ के रास्तों से सफर करने वाली उन ऊँटनियों पर सवार होकर आएं (जो लम्बे सफर से दुबली हो गई हों) (सूरह अलहज्ज 27)। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि ऐ मेरे रब.! मैं कैसे ये पैगाम लोगों तक पहुँचाऊं? आप से कहा गया कि आप हमारे हुक्म के मुताबिक़ आवाज़ लगाएँ, पैगाम को पहुँचाना हमारे ज़िम्मे है। चुनांचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने आवाज़ लगाई, अल्लाह तआला ने अपनी कुदरत से दुनिया के कोने-कोने तक पहुँचाई यहाँ तक कि क़यामत तक जिस शख़्स के मुक़द्दर में भी हज्जे बैतुल्लाह लिखा हुआ था उसने इस आवाज़ को सुनकर लब्बैकक कहा।

जिस तरह दुनिया में बैतुल्लाह (खाना-ए-काबा) का तवाफ़ किया जाता है इसी तरह आसमानों पर अल्लाह तआला का घर है जिसको “बैतुलमामूर” कहा जाता है, उसका हर समय फ़रिश्ते तवाफ़ करते हैं, इस घर के बारे में अल्लाह तआला क़ुरान शरीफ़ में इरशाद फरमाता है: “और क़सम हे “बैतुल मामूर” की”, (सुरह: तूर -4). जब हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम को “मेराज” व “इस्रा” की रात में “बैतुल मामूर” ले जाया गया तो हुज़ूर अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने हज़रत जिब्राईल अलैहिस्सलाम से पूछा यह क्या है? हज़रत जिब्राईल ने कहा कि यह “बैतुल मामूर” है, हर रोज़ सत्तर हज़ार फ़रिश्ते इसका तवाफ़ करते हैं, फिर उनकी बारी दोबारा क़यामत तक नहीं आती”। हदीस की मशहूर किताबों में यह हदीस मौजूद है, “तबरी की रिवायत से मालूम होता है कि बैतुल मामूर बैतुल्लाह (खाना-ए-काबा) के बिल्कुल ऊपर आसमान पर है।

नबी अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया जिस शख्स ने महज़ अल्लाह की ख़ुशनूदी के लिए हज किया और उस दौरान कोई बेहुदा बात या गुनाह नहीं किया तो वह (पाक होकर) ऐसा लौटता है जैसा माँ के पेट से पैदा होने के रोज (पाक था) (बुखारी व मुस्लिम)

दुनिया की शुरुआत से लेकर अब तक इस पाक घर का तवाफ, ऊमरा और हज अदा किया जाता है और इनशाअल्लाह कयामत से पहले बैतुल्लाह के आसमानों पर उठाए जाने तक यह सिलसिला जारी रहेगा। यकीनन कुछ हालात में हज की अदायगी रुकी भी है, मगर सही बुखारी और दूसरी हदीस की किताबों में उल्लेख रसूल-अल्लाह स० के इर्शाद: "कयामत उस वक्त तक कायम नहीं होगी जब तक कि बैतुल्लाह का हज बंद ना हो जाए।" से यह बात स्पष्ट है कि हज का ना होना या हज को स्थगित करना या आजमीने हज को रोकना किसी भी हाल में अच्छी अलामत नहीं है चाहे उसके कुछ भी कारण हों। अल्लाह तआला हम सब की हिफाज़त फरमाए, आमीन!

Dr.  Mohammad Najeeb Qasmi
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समाजवाद का नया चेहरा: शाहिद सिद्धकी

Posted by Indian Muslim Observer | 08 March 2012 | Posted in , ,

उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में एक शख्स ने बेहतर चुनाव प्रबंधन और अपने संचार कौशल की बदौलत समाजवाद को बनाया उत्तर प्रदेश का सिरमौर। वो शख्स है शाहिद सिद्धकी।

धर्मेन्द्र साहू

अब जबकि समाजवादी पार्टी देश के सबसे बड़े प्रदेश की सिरमौर है ऐसे में राजनीतिक विशलेषक इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि आखिर वे कौन सी वजह हैं जिसकी बदौलत पार्टी एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने वाली है। वह भी उन परीस्थितियों में जबकि पार्टी के चेहरे के रूप में पहचान रखने वाले अमर सिंह पार्टी में नहीं रहे। चुनावों से पर्वू समाजवादी पार्टी के आलचकों की बातों पर गौर करें तो, “शायद पार्टी के चाणक्य माने जाने वाले अमर सिंह की अनुपस्थिति में ये चुनाव सपा के अंतिम चुनाव होंगे और सपा इतिहास में बदल जाएगी।”

लेकिन चुनावी परिणामों ने स्वंय ही आलोचकों को जवाब दे दिया है और जो पार्टी इतिहास में बनने वाली थी अब वह इतिहास बनाएगी। राजनीति के प्रकांड पंडित अब मंथन कर रहे हैं कि आखिर समाजवादी पार्टी ने जनता को किन मुद्दों पर अपनी ओर आकर्षित किया और सबसे बड़ी बात वो कौन से लोग हैं जिन्होंने समाजवाद को पैनी धार दी और पार्टी को स्पष्ट बहुमत के साथ भविष्य के राजनीतिक दल के रूप में खड़ा कर दिया।

वैचारिक तौर पर अखिलेश यादव यूपी की चुनावी महाभारत के अर्जुन साबित हुए जिन्होंने तमाम आशंकाओं को संभावनाओं में बदल कर विजय हासिल की लेकिन इस सब के बीच एक ऐसा शख्स भी पार्टी में मौजूद रहा जिसने समाजवाद को जीवित कर कार्यकर्ताओं को दूरदर्शिता दी, जिसने कार्यकर्ताओं को जीतने का मंत्र दिया। एक ऐसा शख्स जो कुछ ही समय में पार्टी की चुनावी रणनीति की धुरी बन गया। अपनी कुशाग्र बुद्धि और जमीन से जुडे व्यक्तित्व के कारण लोगों ने उसे और और पार्टी को अपना समझ कर वोट दिया।

वो शख्स है शाहिद सिद्धकी। हालांकि शाहिद सिद्धकी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में कोई नया नाम नहीं है क्योंकि अपनी स्पष्टवादी विचारों के कारण कई बार उन्होंने पार्टियों को अलविदा कहा लेकिन अपने जनसमर्थन और सख्त तेवरों के कारण पहचान बनाने वाले शाहिद के लिए हर पार्टी ने अपने दरवाजे खोल कर रखे। लेकिन वैचारिक मतभेद के कारण अधिकांश समय तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को ही उन्होंने अपनी कर्मस्थली बनया।

इस बार के उत्तर प्रदेश चुनाव में उन्होंने कोई जोखिम नहीं उठाया है। वह शायद इकलौते शख्स हैं जिन्होंने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान न केवल जन सभाएं की वरन टीवी चैनलों के पैनल डिस्कशन में समाजवादी पार्टी की विचारधारा को आमजन तक पहंचाया। आम जनता को उन्होंने अपनी वाक चपलता से यकीन दिलाया कि बहुजन समाज पार्टी ने सत्ता संभालते ही प्रदेश को क्या-क्या नुकसान पहुंचाया और अगर विधानसभा चुनावों में जनता बसपा, कांग्रेस और भाजपा को विकल्प बनाती है तो प्रदेश का भवियष्य क्या होगा?

सपा कार्यकर्ताओं का मानना था कि शाहिद जी की बदौलत पार्टी में एक चाणक्य का प्रादुभाव हो गया है। एक कार्यकर्ता के अनुसार, “पहले चुनावी कैम्पैनिंग की जाती थी लेकिन सही दिशा और दशा के अभाव में हमारी पहुंच आम जनता तक नहीं थी लेकिन अब शाहिद जी के नेतृत्व में अगर मध्यमवर्गीय जनता तक हमारा संदेश नहीं पहुंच पाता है तो शाहिद जी टीवी स्टूडियों में विपक्ष के सभी नेताओं को अपनी संप्रेषण क्षमता से चुप करा देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके व्यक्तित्व में एक अजीव आकर्षण है लोग उन की कही बातों पर यकीन करते हैं। इसी का परिणाम है कि शायद ही ऐसा कोई टीवी चैनल बचा हो जिन पर शाहिद जी ने अपने और अपनी पार्टी के विचार न रखे हों।

उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि वह बहुत अच्छे वक्ता और श्रोता हैं। यही वजह की उनके पास ज्ञान का अथाह भंडार है। वे देश के उन गिने चुने हुए राजनीतिज्ञों में शामिल हैं जो किसी भी विषय पर लंबे समय तक बोल सकते हैं। इतिहास पर गौर करें तो समाजवादी पार्टी के नेतृव्त में उन्होंने ही सर्वप्रथम मुस्लिम आरक्षण की मांग की थी। इसी का परिणाम है कि पिछड़ा मुसलमान उन्हें अपने सर्वमान्य नेता के रूप में मानता है।

उनकी माने तो, “देश के विकास के लिए मुसलमानों का विकास अतिआवश्यक है। आजादी के 60 साल बीत जाने के बावजूद देश के दूसरी सबसे बड़ी कौम बेहद विकट परीस्थितियों में है। अगर हम गौरवपूर्ण धर्मनिरपेक्ष देश की बात करते हैं तो हम ये कैसे भूल जाते हैं कि देश की एक विशेष कौम का बड़ा हिस्सा गुरवत में जी रहा है।"

हालांकि उन पर मुसलमानों के संदर्भ में राजनीति करने का इल्जाम लम्बे समय से लगता आ रहा है लेकिन उन्हें इस बात की कोई अफसोस नहीं हैं। एक पत्रकार द्वारा जब मुस्लिम तुष्टिकरण पर उन से सवाल पूछा गया तो उनका कहना था कि, “एक जरूरतमंद कौम की हक की बात करना कहां का तुष्तिकरण है? जब आरक्षण की मांग के लिए लोग रेलवे ट्रेक रोक लेते हैं, दिल्ली का पानी बंद कर देते हैं तब उनसे कोई कुछ नहीं कहता है लेकिन अगर देश का मुसलमान आरक्षण की मांग के लिए शांतीपूर्ण मांग करे तो वो भी हिंसा है।”

चुनाव परिणाम आने के बाद जब उनसे पूछा गया कि वे परिणामों के संबंध में क्या उम्मीद कर रहे थे, ऐसे में उनका जवाब था, “इससे भी बेहतर”। हालांकि कार्यकर्ताओं का मानना था कि विजय उत्सव के इस माहौल में शाहिद सिद्धकी चुनावी भागदौड़ के बाद आराम करेंगे। लेकिन जब उनसे पूछा गया तो जवाब बिल्कुल विपरीत था उनका कहना था कि, “काम तो अब शुरू हुआ है। जनता ने जिस उम्मीद से उन्हें और समाजवादी पार्टी को चुना है उसको साबित करने का समय आ गया है। हमें समाज के सबसे अंतिम छोड़ पर खड़े व्यक्ति को अहसास दिलाना है कि वह भी विकास कर रहा है और उसका भविष्य सही और मजबूत हाथों में है।”

जामिया नगर में नागरिक अधिकारों के लिए विषाल मार्च

Posted by Indian Muslim Observer | 26 February 2012 | Posted in , , , , ,

नर्इ दिल्ली  एसोसिएषन फार प्रोटेक्षन आफ सिविल राइटस एपीसीआर की दिल्ली षाखा के द्वारा जामिया नगर थाने से ओखला हेड, तिकोना पार्क बटला हाउस जाकिर नगर होते हुए मसिजद खलिलुल्लाह तक एक विषाल रैली का आयोजन हुआ।

एसोसिएषन फार प्रोटेक्षन आफ सिविल राइटस (एपीसीआर) की दिल्ली षाखा के सचिव श्री एखलाक़ अहमद ने रैली को संबोधित करते हुए कहा कि पुलिस जनता की रक्षा के लिए है उनको डराने एवं उनका अपहरण करने के लिए नहीं। उन्होंने लोगों का आहवान किया कि वे  अपने अधिकारों के प्रति जागरुक बनें और उनकी सुरक्षा के लिए खड़े हों 

सभा को संबोधित करते हुए एपीसीआर की दिल्ली षाखा के उपाध्यक्ष एडवोकेट फिरोज़ ख़्kन ग़ाज़ी ने कहा कि कानून ने नागरिकों को जो अधिकार दिए हैं उनकी रक्षा करना राज्य सरकार, प्रषासन और पुलिस की जि़म्मेदारी है। लेकिन आज यही नागरिकों के अधिकारों का हनन करने में लगे हैं। जनता को इसका विरोध करना चाहिए। क़ानून तोड़ने का अधिकार किसी को नहीं है।

मार्च को संबोधित करते हुए जमाअत इसलामी हिन्द के राष्ट्रीय सचिव इंजीनियर मोहम्मद सलीम ने कहा कि एपीसीआर की दिल्ली षाखा ने सही समय पर जन जागरुकता अभियान छे्रड़ा है। वर्तमान में जबकि नागरिक अधिकारों का हनन बढ़ रहा है आवष्यक है कि लोगों को उनके अधिकारों के प्रति सचेत किया जाए। मार्च को छात्र संगठन स्टूडेंटस इस्लामिक आर्गेनाइजेषन आफ इंडिया के प्रदेष अध्यक्ष श्री अनीसुर्रहमान ने भी संबोधित किया।


एपीसीआर की दिल्ली षाखा की ओर से छेड़े गए नागरिक जागरुकता अभियान के अन्तर्गत नुक्कड़ सभाएं, हैंडबिल वितरण, और मसिजदों के एमामों से मुलाकात करके उन्हें नागरिक अधिकारों के बारे में बताया जा रहा है ताकि लोगों में जागरुकता पैदा हो सके और वे अपने संवैधानिक अधिकारों को जान सकें और उनकी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हों।


मार्च में लगभग दो सौ सामाजिक कार्यकर्ता वकील एवं छात्रों ने भाग लिया।


Akhlak Ahmad 
Association for Protection of Civil Rights(APCR)
108-III Floor,Pocket-1
Behind Living Style Mall
Jasola Vihar
New Delhi-25
Phone # 011-64639388
Mob # 9899384358

कांग्रेस के झंडे में शंकराचार्य का पंजा!

Posted by Indian Muslim Observer | 18 March 2011 | Posted in , ,

वाराणसी [एल.एन. त्रिपाठी]। कभी तिरंगे में चरखा, कभी दो बैलों की जोड़ी तो कभी गाय व बछड़ा। पिछले सवा सौ साल के इतिहास में कांग्रेस कई चुनाव चिन्ह देख चुकी है। इसमें सिर्फ पंजा ही ऐसा चुनाव निशान है जो सबसे लंबे समय से पार्टी के साथ है। यह अलग बात है कि इस धर्मनिरपेक्ष पार्टी का यह पंजा खासा धार्मिक है। यह कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य का पंजा है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गंाधी के गर्दिश के दिनों में दिए गए इस आशीर्वाद ने उस समय न सिर्फ इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी कराई थी वरन कांग्रेस को फिर से खड़ा करने में भी अहम रोल निभाया था।

एनी बेसेंट के थियोसॉफिकल सोसायटी के सक्रिय सदस्यों एलन ऑक्टोवियन ह्युंम व अन्य द्वारा 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1931 में तिरंगे को अपने पहले झंडे के रूप में स्वीकार किया था। आजादी के बाद तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज बन गया। इसके बाद काफी दिनों तक दो बैलों की जोड़ी पार्टी का चुनाव चिह्न रहा। 1969 में पार्टी में विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने इस चिह्न को जब्त कर लिया। उस समय कामराज के नेतृत्व वाली पुरानी कांग्रेस को तिरंगे में चरखा जबकि नई कांग्रेस को गाय बछड़े का चुनाव चिह्न दिया गया। 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद का दौर कांग्रेस के लिए सर्वाधिक खराब समय रहा। पार्टी में कई धड़े हो गए। इसको देखते हुए चुनाव आयोग ने गाय बछड़े के चिह्न को भी जब्त कर लिया। इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश व रायबरेली में करारी हार के बाद सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस के अलंबरदार काफी विचलित थे।

कांची कामकोटि मठ, वाराणसी के प्रबंधक वीएस सुब्रमण्यम मणिजी के अनुसार ऐसे समय में श्रीमती इंदिरा गांधी तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती का आशीर्वाद लेने गई। वह काफी देर तक बात करती रहीं पर शंकराचार्य मौन रहे। उठने लगीं तो शंकराचार्य ने दाहिना हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। श्रीमती गांधी ने तत्काल इसी हाथ [पंजा] को अपना चुनाव चिह्न बनाने का निर्णय लिया।

इस प्रसंग का आन्ध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन भास्करराव ने भी अपनी जीवनी में बहुत विस्तार से उल्लेख किया है। उनके अनुसार यह 1978 की बात है। उस समय आन्ध्र समेत चार राज्यों का चुनाव चल रहा था। श्रीमती गांधी ने उस समय कांग्रेस-आई की स्थापना की थी और उन्हें चुनाव आयोग में अपना चुनाव चिह्न बताना था। आन्ध्र के दौरे पर गई श्रीमती गांधी ने शंकराचार्य से मिलने की इच्छा जताई थी। शंकराचार्य उस समय मदनपल्लै में थे। श्रीमती गांधी, भास्कर राव के साथ तत्काल मदनपल्लै गई। उन्होंने शंकराचार्य से आशीर्वाद मांगा साथ ही पार्टी सिंबल के लिए सुझाव भी। शंकराचार्य ने दाहिना हाथ हिलाया। श्रीमती गांधी ने इसे उनका इशारा मान कांग्रेस के झंडे में पंजे को शामिल करने का निर्देश दे दिया। यही बाद में कांग्रेस का चुनाव चिह्न बन गया।

खुद श्री राव ने इसे माना है कि यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। जीवनी के अनुसार शंकराचार्य के इस आशीर्वाद के बाद कांग्रेस तुरंत पुनर्जीवित हो गई। उस समय हुए चार राज्यों के चुनाव में कांग्रेस की जोरदार जीत हुई साथ ही श्रीमती गांधी भी अपना चुनाव जीत गई। तत्कालीन सारे दिग्गजों को दरकिनार करते हुए यह कांग्रेस-आई ही बाद में मुख्य कांग्रेस पार्टी के रूप में स्थापित हुई। ज्ञात हो कि ब्रह्मलीन स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती की 118वीं जन्म जयन्ती इस समय मनाई जा रही है। (Jagran)

माशा अल्लाह! माशा के क्या कहने

Posted by Indian Muslim Observer | 11 February 2011 | Posted in , , ,

दस्तक
 
चेन्नई की मासूम माशा नजीम ने बनाया ऐसा सीलमेकर, जिसे सरकारी कार्यालयों में सील लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

तमिलनाडु सरकार ने माशा को सीलमेकर पर दस हजार का नकद इनाम देकर सम्मानित किया। केरल और गुजरात सरकार ने आश्वस्त किया है कि उसकी खोज को विभिन्न विभागों में इस्तेमाल किया जाएगा।

चेन्नई के इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ रही 18 वर्षीय माशा नजीम ने एक ऐसे सील मेकर की खोज की है, जिसे सरकार ने अप्रूव कर दिया है। माशा के इस आविष्कार को जल्द ही सरकार कार्यालयों में सील लगाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।

चाहे प्रधानमंत्री कार्यालय के कागजात हो या फिर बोर्ड परीक्षाओं की कॉपियां। गोपनीयता बरकरार रखने के लिए रेड वेक्स सील सबसे अहम होती है। लेकिन सील लगाने की प्रक्रिया में अगर छोटी-सी असावधानी रह जाए और इन कागजों में आग लग जाए तो इसकी भरपाई कर पाना नामुमकिन है। ऐसा ही कुछ नजीम के साथ भी घटित हुआ। नजीम बताती हैं कि जब वह दसवीं कक्षा में थी, तभी उसे एक पत्र मिला जिसमें लिखा था कि उसकी उत्तर पुस्तिका जल गई है। हालांकि उसे दुबारा परीक्षा में तो नहीं बैठना पड़ा और टोकन अंक मिल गए, लेकिन तभी उसने ठान लिया था कि वह किसी और के साथ ऐसा नहीं होने देगी। इसके बाद माशा ने अपने दृढ़ निश्चय को हकीकत में बदलते हुए यह मशीन बना दी। उसे पता चला कि उसकी कॉपियां उस वक्त जलीं, जब इन पर सील लगाई जा रही थी। इसके बाद उसने अपने पापा के ऑफिस में देखा कि सरकारी तौर पर अभी भी सील लगाने के लिए परंपरागत तरीके का इस्तेमाल होता है। इसे देखकर वह बहुत दुखी हुई। उसने ठान लिया कि जिस पीड़ा से वह खुद गुजरी है, किसी और के साथ ऐसा नहीं होने देगी।

माशा की इस खोज में सील लगाने के लिए आग का इस्तेमाल नहीं किया जाता। यह विद्युत के ऊष्मीय सिद्धांत पर आधारित है। माशा बताती हैं कि इसमें लाख के बहाव को यूजर कंट्रोल कर सकता है। इसमें जो पदार्थ इस्तेमाल होता है, वह १६० डिग्री सेंटीग्रेड पर पिघलता है। यह सीलमेकर सरकार के सभी नियमों पर पूरी तरह से खरा उतरता है।

ऐसे करता है काम

इस्तेमाल करने के लिए मशीन को बिजली के प्लग में लगाया जाता है। वेक्स स्टिक को मशीन में रखते हैं और बस तीन से चार मिनट में यह सील बनकर तैयार हो जाती है। सीलमेकर के भीतर एक बॉयलर लगा होता है, जो इसे गर्म कर देता है तब वेक्स स्टिक पर लगी वेक्स पिघलने लगती है और सही तरीके से पेपर सील पर फैल जाती है।

यह मशीन बेहद हल्की है और आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाई जा सकती है। इसे एक हाथ से भी हैंडल किया जा सकता है। माशा का यह फ्लैमलैस सीलमेकर जल्द ही सरकार के कामकाज के तरीके को बदल देगा। माशा को इस आविष्कार के लिए कई जगह पुरस्कृत किया जा चुका है।

यह तो शुरुआत हैमाशा की मंजिल यहीं पर खत्म नहीं होती, बल्कि यह उसके रास्तों की शुरुआत है। माशा फिलहाल इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियरिंग में पढ़ाई कर रही है और रिसर्चर बनना चाहती है। इसके अलावा माशा ने ट्रेन के लिए हाईजीनिक ड्रेनेज सिस्टम का विकास किया है। इसके लिए पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने भी सराहना की। इस प्रोजेक्ट को जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय बाल विज्ञान प्रदर्शनी में प्रथम स्थान भी मिल चुका है। Link

पुलिस उत्पीड़न में यूपी दूसरे नंबर पर

Posted by Indian Muslim Observer | 07 February 2011 | Posted in , ,

मुजफ्फरनगर [मनीष शर्मा]। उत्तर प्रदेश पुलिस पर अक्सर उत्पीड़न और फर्जी खुलासों के आरोप लगते रहे हैं। परंतु अब हकीकत के धरातल पर भी यूपी की खाकी देश में सबसे ज्यादा 'दागी' है। राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो [एनसीआरबी] के मुताबिक मध्यप्रदेश पुलिस के खिलाफ सबसे ज्यादा शिकायतें की गईं। दूसरे पायदान पर यूपी पुलिस है। यूपीपी के खिलाफ 10953 शिकायतें हुई। शर्मनाक ये है कि जांच के बाद सबसे ज्यादा यूपी के मामले में सही पाई गई।

सत्ता में आने के बाद कहने को बसपा का मुख्य एजेंडा सूबे में पुलिस की छवि और कानून व्यवस्था में सुधार रहा। हालांकि 'खाकी' पर इसका दबाव नजर नहीं आया। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो [एनसीआरबी] की गत माह जारी रिपोर्ट 'क्राइम इन इंडिया 2009' भी इसकी तस्दीक कर रही है।

रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में मध्यप्रदेश पुलिस के खिलाफ सबसे ज्यादा 15,903 शिकायतें मिलीं, जबकि दूसरे पायदान पर यूपी पुलिस के खिलाफ 10,953 शिकायतें हुई। पंजाब पुलिस 4,212 शिकायतों के साथ तीसरे नंबर पर है।

ऐसे लगा खाकी पर 'दाग'

एमपी पुलिस के खिलाफ मिलीं शिकायतों में 11,261 जांच के दौरान झूठी साबित हुई, जबकि यूपी पुलिस के खिलाफ हुई 3,041 शिकायतें ही फर्जी मिलीं। ऐसे में यूपी पुलिस के खिलाफ सबसे ज्यादा 7,912 शिकायतें सही मिलीं और पंजीकृत हुई। इसी क्रम में 7,734 शिकायतों में विभागीय कार्रवाई की संस्तुति की गई। जबकि शेष में चार्जशीट दाखिल की गई। एमपी पुलिस के खिलाफ 4,014 दर्ज हुए और पंजाब पुलिस के खिलाफ मात्र 69 शिकायतें हुई पंजीकृत की गईं।

उद्दंडता में भी आगे

उत्तर प्रदेश की पुलिस वालों पर खाकी का सुरूर इस कदर हावी है कि उद्दंडता करने में भी यूपी के पुलिसवाले सबसे आगे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक यूपी के 8,001 पुलिस वालों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की गई। जबकि दूसरे नंबर पर राजस्थान के 4,271 पुलिस वाले रहे। कठोर दंड पाने के मामले में भी यूपी पुलिस सबसे आगे हैं। उद्दंडता व शिकायतों के चलते यूपी के 170 पुलिसकर्मियों को डिसमिस किया गया। जबकि 492 को बड़ा व 6,612 को हल्की सजा दी गई। इसी क्रम में राजस्थान, पंजाब और फिर गुजरात पुलिस का नंबर है। (Dainik Jagran)

ईसाई भी शिकार हैं संघ प्रेरित आतंकवाद के

Posted by Indian Muslim Observer | 30 January 2011 | Posted in , , ,

फादर डॉमनिक एमानुएल

स्वामी असीमानंद द्वारा मालेगॉव,हैदराबाद की मक्का मस्जिद,अजमेर की दरगाह शरीफ और समझौता एक्सप्रेस में बम विस्फोटों में अपना हाथ होना स्वीकार करने के पश्चात् मीड़िया व सार्वजनिक क्षेत्र में विवाद इस बात को लेकर नही है कि अब इसे हिन्दु आंतकवाद की संज्ञा दी जाए अथवा गेरुआ आंतकवाद।


विवाद अब एक ओर इस बात को लेकर है कि स्वामी असीमानंद के साथ आर.एस.एस. के इन्द्रेश कुमार सहित अन्य कार्यकर्ताओ का कितना हाथ होना और दूसरी ओर आर.एस.एस. के मुखिया मोहन भागवत और भाजपा अध्यक्ष नितिन गडकरी द्वारा कांग्रेस पर यह आरोप लगाना कि यह सब 2जी स्पेक्ट्रम व कॉमनवेल्थ खेलों में हुए घोटालों से ध्यान हटाने की एक चाल है अर्थात उनका कहना है कि हिन्दु संगठनों के आंतकी हमलों में न तो आर.एस.एस. का हाथ है और न ही स्वामी असीमानंद द्वारा रहस्योदघाटन में कुछ सच्चाई है।

चंद अखबारों और टीवी चैनलों को छोड़ कर, सामान्यरुप मीड़िया ‘बम के जवाब में बम’ नीति में लिप्त पाए गये अपराधियों के बारे में बहुत ज्यादा चर्चा नही कर रहा है। मीड़िया में एक और महत्वपूर्ण मुददा जो अभी तक उजागर नही हुआ है और जिसके लिए मैं पिछले दो साल से प्रयत्नरत् हूं कि मीडिया व जांच पड़ताल करनी वाली संस्थाऐं क्योंकर केवल मुस्लिम ठिकानों पर बम विस्फोट को ही हिन्दू संगठनों के आतंकवाद तक सीमित रखे हुए है ? मुझे इस बात से बेहद हैरानी है कि ना तो मीड़िया ने और ना ही अन्य संस्थाओं ने; इन्ही हिन्दू संगठनों द्वारा ईसाई समुदाय पर हुए जानलेवा हमलों को हिन्दू आतंकवाद से जोड़ने की बात सोची। पिछले कुछ वर्षो में इन संगठनों द्वारा ईसाई संस्थानों व उनके नन व पादरियों पर हमलों की संख्या प्रतिवर्ष एक हजार की संख्या पार कर चुकी है। मध्यप्रदेश में चर्च के प्रवक्ता फादर आनंद मुटुगंल की अगुवाई में दायर एक याचिका पर मध्यप्रदेश उच्च न्यायलय ने मध्यप्रदेश सरकार से इस बात का स्पष्टीकरण मांगा है कि वहॉ पर जब से भाजपा की सरकार आई है, ईसाईयों पर हिन्दू संगठनों द्वारा 180 से अधिक हमले कैसे हुए?

बम विस्फोटों की गंभीर घटनाओं की छानबीन के बाद अब जाकर मीड़िया का ध्यान असीमानंद जैसे लोगों पर आकर टिका है। ये वही असीमानंद है जिन्होनें गुजरात के डांग जिले में ईसाईयों को निशाना बनाने का भार अपने कंधों पर लिया था। स्वामी असीमानंद बंगाल से 1995 में डांग में आकर बसे और उसी क्षण से उन्होनें वहॉ के ईसाईयों के विरुद्व काम करना आरंम्भ कर दिया। दिसंबर 1998 में क्रिसमस के ही दिन जब ईसाई बड़ी मात्रा में क्रिसमस मनाने एकत्र हुए तो उन्होनें ठीक उसी स्थान पर एक विशाल हिन्दू रैली का आयोजन किया। ईसाईयों की भीड़ में अपने आदमी को भेजकर अपनी रैली पर पत्थर फिकवाएं और उसके बहाने ईसाईयों के खिलाफ आंतकवादी गतिविधियों का जो सिलसिला जारी किया वह पूरे बारह दिनों तक चलता रहा जिसमें असीमानंद से प्रेरित आंतकवादियों ने डांग जिले के कई गिरजाघरों और स्कूलों में जमकर आगजनी की और ईसाई ननों व पादरियों के साथ मारपीट व अभद्र व्यवहार किया। उस समय पीडित ईसाई समाज को समझ नही पड़ रहा था कि वे सहायता के लिए किस ओर झांके क्योंकि गुजरात में भी भाजपा की सरकार और केन्द्र में भी थी भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार।

उसी दौरान तत्कालीन प्रधांनमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बयान दिया कि देश में धर्म परिर्वतन पर बहस होनी चाहिए। इस बयान ने ईसाईयों के जले पर नमक छिडकने का काम किया। इससे ईसाईयों के विरुद्व असीमानंद और लक्ष्मानंद सरस्वती जैसे आंतक फैलाने वालों को तो यह स्पस्ट संदेश मिल ही गया कि वे ईसाईयों के विरुद्व अपना काम बेधड़क रुप से चलने दें। उन्हें न तो सरकार का, ना पुलिस का और न ही छानबीन करने वाली संस्थाओं का कोई डर था। ‘बम के बदले बम’ की नीति अपनाने से पहले और ईसाईयों पर और अधिक कहर ढहाने के उददेष्य से असीमानंद ने ही डांग जिले में 2006 में पहली बार शबरी कंभ का आयोजन यह नारा देकर किया ‘‘हर एक आदमी जो ईसाई बनता है उससे देश का एक दुश्मन बढ़ता है।’’

स्वामी असीमानंद के 1998 के षड़यंत्र के तर्ज पर 2007 में स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती ने भी वही खेल उड़ीसा के कंधमाल में दोहराया। 23 दिसंबर 2007 को कंधमाल जिले के गॉव में जब ईसाई क्रिसमस की तैयारी में सजावट कर रहे थे तो स्वामी लक्ष्मणानंद ने अपने कुछ चेलों के साथ वहॉ पहुचकर उन्हें सब बंद करने को कहा क्योंकि वे वहॉ पर कुछ हिन्दू त्यौहार मनाना चाहते थे। उस समय शुरु हुई छोटी सी झड़प ने दंगों का रुप धारण कर लिया और लक्ष्मणानंद के लोगों ने वहॉ के ईसाईयों और उनकी संस्थाओं पर लगातार आठ दिनों तक हमला किया। आठ महीने बाद 23 अगस्त 2008 में स्वामी लक्ष्मणानंद की माओवादियों ने हत्या कर दी और पुलिस के कथन और माओवादियों द्वारा उनकी हत्या की जिम्मेदारी लेने के बावजूद इन हिन्दू आंतकवादियों ने लगातार 42 दिनों तक ईसाईयों पर इस कदर बेरहमी से आक्रमण किया कि उसमें 100 लोगों की जानें गई,कई घायल हुए,147 गिरजाघर व ईसाई संस्थानों को और 4000 से ज्यादा घरों को जलाया और तोड़ा गया जिसके फलस्वरुप लगभग 50,000 लोग बेघर हो गये।

ग्लेंडिस स्टेंस के पति और उनके मासूम बेटों की हत्या के बाद दारा सिंह जैसे आंतकवादी को ग्लेडिस द्वारा क्षमा प्रदान करने का भी ईसाईयों के विरुद्व घृणा से भरे इन क्रूर लोगों पर कोई असर नहीं पड़ा।

कर्नाटक में जब से भाजपा की सरकार बनी है, वहॉ पर ईसाईयों पर हमलों की संख्या दिन दुगनी और रात चौगुनी हो गई है। कर्नाटक उच्च न्यायलय के न्यायधीश जस्टिस माइकल सलडाना के अनुसार कर्नाटक में 500 दिनों के भीतर ईसाईयों और उनकी संस्थाओं पर 1000 आक्रमण हुए और ये केवल राम सेना के कार्यकर्ताओं ने नही किए थे, इनमें बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद,आरएसएस और भाजपा के कार्यकर्ता शामिल है।

ईसाई समुदाय का मानना है कि बम विस्फोटों में लिप्त कार्यकताओं को अवष्य ही हिन्दू आंतकवाद के नाम पर पकड़ा जाना चाहिए, परंतु फिर भी उनका सवाल मीडिया, सरकार और छानबीन करने वाली संस्थाओं से है कि उनके समुदाय पर इतनी बड़ी संख्या में इन्ही आंतकवादियों द्वारा किये गए हमलों को कोई गम्भीरता से क्यों नही लेता। वोट बैक की तलाश में रहने वाले राजनीतिक दलों से तो कोई उम्मीद नही की जा सकती पर मीडिया से तो उम्मीद की ही जा सकती है कि कम से कम वह तो उनकी बात को अवष्य ही आम लोगों के सामने लेकर आयेगा।

आरएसएस ने 1948 में तिरंगे को पैरों तले रौंदा था!

Posted by Indian Muslim Observer | 28 January 2011 | Posted in , ,

शेष नारायण सिंह

श्रीनगर के लाल चौक पर झंडा फहराने की बीजेपी की राजनीति पूरी तरह से उल्टी पड़ चुकी है. बीजेपी की अगुवाई वाले एनडीए के संयोजक शरद यादव तो पहले ही इस झंडा यात्रा को गलत बता चुके हैं, अब बिहार के मुख्यमंत्री और बीजेपी के महत्वपूर्ण सहयोगी नीतीश कुमार ने श्रीनगर में जाकर झंडा फहराने की जिद का विरोध किया है. शरद यादव ने तो साफ़ कहा है कि जम्मू कश्मीर में जो शान्ति स्थापित हो रही है उसको कमज़ोर करने के लिए की जा रही बीजेपी की झंडा यात्रा का फायदा उन लोगों को होगा जो भारत की एकता का विरोध करते हैं.

नीतीश कुमार ने बीजेपी से अपील की है कि इस फालतू यात्रा को फ़ौरन रोक दे. सूचना क्रान्ति के चलते अब देश के बहुत बड़े मध्य वर्ग को मालूम चल चुका है कि झंडा फहराना बीजेपी की राजनीति का स्थायी भाव नहीं है, वह तो सुविधा के हिसाब से झंडा फहराती रहती है. बीजेपी की मालिक आरएसएस के मुख्यालय पर 2003 तक कभी भी तिरंगा झंडा नहीं फहराया गया था. वो तो जब 2004 में तत्कालीन बीजेपी की नेता उमा भारती तिरंगा फहराने कर्नाटक के हुबली की ओर कूच कर चुकी थीं तो लोगों ने अखबारों में लिखा कि हुबली में झंडा फहराने के साथ-साथ उमा भारती को नागपुर के आरएसएस के मुख्यालय में भी झंडा फहरा लेना चाहिए. तब जाकर आरएसएस ने अपने दफ्तर पर झंडा फहराया. 2004 के विवाद के दौरान भी उतनी ही हड़कंप मची थी जितनी आज मची हुई है, लेकिन तब टेलीविज़न की खबरें इतनी विकसित नहीं थी, इसलिए बीजेपी की धुलाई उतनी नहीं हुई थी जितनी आजकल हो रही है.

तिरंगा फहराने के बहाने बहुत सारे सवाल भी बीजेपी वालों से पूछे जा रहे हैं. अभी कुछ साल पहले कुछ कांग्रेसी तिरंगा लेकर चल पड़े थे और उन्होंने ऐलान किया था कि वे आरएसएस के नागपुर मुख्यालय पर भी तिरंगा झंडा फहरा देगें. रास्ते में उन पर लाठियां बरसाई गयी थी. लोग सवाल पूछ रहे हैं कि उस वक़्त के तिरंगे से क्यों चिढ़ी हुई थी बीजेपी जो महाराष्ट्र में अपनी सरकार का इस्तेमाल करके तिरंगा फहराने जा रहे कांग्रेसियों को पिटवाया था. जब उमा भारती ने 2004 हुबली में झंडा फहराने के लिए यात्रा की थी तो विद्वान इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने प्रतिष्ठित अखबार द हिन्दू में एक बहुत ही दिलचस्प लेख लिखा था.

उन्होंने सवाल किया था कि बीजेपी आज क्यों इतनी ज्यादा राष्ट्रप्रेम की बात करती है. खुद ही उन्होंने जवाब का भी अंदाज़ लगाया था कि शायद इसलिए कि बीजेपी की मातृ संस्था आरएसएस ने आज़ादी की लड़ाई में कभी हिस्सा नहीं लिया था. 1930 और 1940 के दशक में जब आज़ादी की लड़ाई पूरे उफान पर थी तो आरएसएस का कोई भी आदमी या सदस्य उसमें शामिल नहीं हुआ था. यहाँ तक कि जहां भी तिरंगा फहराया गया आरएसएस वालों ने कभी उसे सैल्यूट तक नहीं किया. आरएसएस ने हमेशा ही भगवा झंडे को तिरंगे से ज्यादा महत्व दिया. 30 जनवरी 1948 को जब महात्मा गाँधी की हत्या कर दी गयी तो इस तरह की खबरें आई थीं कि आरएसएस के लोग तिरंगे झंडे को पैरों से रौंद रहे थे. यह खबर उन दिनों के अखबारों में खूब छपी थीं. आज़ादी के संग्राम में शामिल लोगों को आरएसएस की इस हरकत से बहुत तकलीफ हुई थी. उनमें जवाहरलाल नेहरू भी एक थे. 24 फरवरी को उन्होंने अपने एक भाषण में अपनी पीड़ा को व्यक्त किया था. उन्होंने कहा कि खबरें आ रही हैं कि आरएसएस के सदस्य तिरंगे का अपमान कर रहे हैं. उन्हें मालूम होना चाहिए कि राष्ट्रीय झंडे का अपमान करके वे अपने आपको देशद्रोही साबित कर रहे हैं.

यह तिरंगा हमारी आज़ादी के लड़ाई का स्थायी साथी रहा है, जबकि आरएसएस वालों ने आज़ादी की लड़ाई में देश की जनता की भावनाओं का साथ नहीं दिया था. तिरंगे की अवधारणा पूरी तरह से कांग्रेस की देन है. तिरंगे झंडे की बात सबसे पहले आन्ध्र प्रदेश के मसुलीपट्टम के कांग्रेसी कार्यकर्ता पी वेंकय्या के दिमाग में उपजी थी. 1918 और 1921 के बीच हर कांग्रेस अधिवेशन में वे राष्ट्रीय झंडे को फहराने की बात करते थे. महात्मा गाँधी को यह विचार तो ठीक लगता था लेकिन उन्होंने वेंकय्या जी की डिजाइन में कुछ परिवर्तन सुझाए. गाँधी जी की बात को ध्यान में रखकर दिल्ली के देशभक्त लाला हंसराज ने सुझाव दिया कि बीच में चरखा लगा दिया जाए तो ज्यादा सही रहेगा. महात्मा गाँधी को लालाजी की बात अच्छी लगी और थोड़े बहुत परिवर्तन के बाद तिरंगे को राष्ट्रीय ध्वज के रूप में स्वीकार कर लिया गया. उसके बाद कांग्रेस के सभी कार्यक्रमों में तिरंगा फहराया जाने लगा. अगस्त 1931 में कांग्रेस की एक कमेटी बनायी गयी, जिसने झंडे में कुछ परिवर्तन का सुझाव दिया. वेंकय्या के झंडे में लाल रंग था. उसकी जगह पर भगवा पट्टी कर दी गयी. उसके बाद सफ़ेद पट्टी और सबसे नीचे हरा रंग किया गया. चरखा बीच में सफ़ेद पट्टी पर सुपर इम्पोज कर दिया गया. महात्मा गाँधी ने इस परिवर्तन को सही बताया और कहा कि राष्ट्रीय ध्वज अहिंसा और राष्ट्रीय एकता की निशानी है.

आज़ादी मिलने के बाद तिरंगे में कुछ परिवर्तन किया गया. संविधान सभा की एक कमेटी ने तय किया कि उस वक़्त तक तिरंगा कांग्रेस के हर कार्यक्रम में फहराया जाता रहा है लेकिन अब देश सब का है. उन लोगों का भी जो आज़ादी की लड़ाई में अंग्रेजों के मित्र के रूप में जाने जाते थे. इसलिए चरखे की जगह पर अशोक चक्र को लगाने का फैसला किया गया. जब महात्मा गाँधी को इसकी जानकारी दी गयी तो उन्हें ताज्जुब हुआ. बोले कि कांग्रेस तो हमेशा से ही राष्ट्रीय रही है. इसलिए इस तरह के बदलाव की कोई ज़रुरत नहीं है, लेकिन उन्हें नयी डिजाइन के बारे में राजी कर लिया गया. इस तिरंगे की यात्रा में बीजेपी या उसकी मालिक आरएसएस का कोई योगदान नहीं है, लेकिन वह उसी के बल पर कांग्रेस को राजनीतिक रूप से घेरने में सफल होती नज़र आ रही है. अजीब बात यह है कि कांग्रेसी अपने इतिहास की बातें तक नहीं कर रहे हैं. अगर वे अपने इतिहास का हवाला देकर काम करें तो बीजेपी और आरएसएस को बहुत आसानी से घेरा जा सकता है और तिरंगे के नाम पर राजनीति करने से रोका जा सकता है।

लेखक देश के जाने-माने जर्नलिस्ट हैं।

साभार: Bhadas4media. com

बाबरी मस्जिद विवादस्पद स्थल पर बौद्धों ने दायर की याचिका

Posted by Indian Muslim Observer | 07 January 2011 | Posted in , ,


नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में दायर एक विशेष अनुमति याचिका में दावा किया गया है कि बाबरी मस्जिद के स्थान पर एक बौद्ध विहार मौजूद था और इसलिए अयोध्या के विवादास्पद स्थल को इस धर्म के मतावलंबियों को दे दिया जाना चाहिए।

बौद्ध एजुकेशन फाउंडेशन और अखिल भारतीय अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति संगठनों के संघ के अध्यक्ष उदित राज ने अयोध्या के स्वामित्व को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के फैसले के जवाब में कल यह याचिका दायर की। राज ने एक संवाददाता सम्मेलन में यह जानकारी देते हुए कहा, 'भारत में रह रहे बौद्ध फैसले की वैधता और संवैधानिकता को चुनौती देते हैं। न केवल विवादित स्थल बल्कि बाबरी मस्जिद के निर्माण से पहले यह पूरा स्थल एक बौद्ध विहार था।'

इस मौके पर राज के साथ उपस्थित पूर्व केंद्रीय मंत्री और भारतीय जनशक्ति पार्टी के नेता संघप्रिय गौतम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए इस तर्क का समर्थन करने का आग्रह किया।

गौतम ने कहा, 'न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने कहा कि विवादित स्थल के कसौटी स्तंभ वाराणसी में मौजूद बौद्ध स्तंभों के समान हैं। न्यायमूर्ति एस यू खान ने कहा कि ब्रिटिश पुराविद कारनेजी ने कहा था कि मस्जिद के निर्माण में इस्तेमाल किए गए कसौटी स्तंभ उन बौद्ध स्तंभों के समान हैं जिन्हें उन्होंने वाराणसी में देखा है।'

उन्होंने कहा, 'इसलिए यह संभव है कि उस स्थल पर या उसके आस पास किसी बौद्ध धार्मिक स्थल के अवशेष रहे हों जहां मस्जिद का निर्माण किया गया था और इसकी कुछ सामग्री का इस्तेमाल मस्जिद के निर्माण में किया गया हो।' राज ने कहा कि अपनी रिपोर्ट में भारतीय पुरातत्व सर्वे ने 2003 में कहा था कि सर्वे ने विवादित स्थल के नीचे एक गोलाकार पूजास्थल पाया जिसके बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उससे और सबूत जुटाने को कहा था।

राज ने कहा, 'अब तक ऐसा नहीं किया गया है। इस बात की सर्वाधिक संभावना है कि यह बौद्धों का मठ है। मस्जिद का निर्माण बौद्ध विहार के अवशेषों पर किया गया है और इसलिए इसे बौद्धों को दिया जाना चाहिए।'

उन्होंने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वे ने कहा है कि विशालकाय संरचना के साथ स्तंभों के आधार उन अवशेषों का संकेत देते हैं जो उत्तर भारत के मंदिरों की खास पहचान हैं।

ब्रिटेन में मुस्लिम बनने की संख्या में इजाफा

Posted by Indian Muslim Observer | 05 January 2011 | Posted in

लंदन। विभिन्न धर्मो के बारे में शोध करने वाले एक थिंक टैंक ने अपने एक विस्तृत अध्ययन में कहा है कि ब्रिटेन में पिछले दशक के दौरान धर्मांतरण कर मुस्लिम बनने वाले ब्रिटेनवासियों की संख्या में काफी इजाफा हुआ है।

फेथ मैटर्स नाम के इस थिंक टैंक ने धर्मांतरण कर मुस्लिम बनने वाले ब्रिटेनवासियों के बारे में कहा है कि ऐसे लोगों की संख्या एक लाख तक हो सकती है और हर साल करीब पांच हजार लोग मुस्लिम बन रहे हैं। हालांकि इस अध्ययन से पहले धर्मांतरण करने वाले लोगों की संख्या 14 हजार से 25 हजार के बीच बताई गई थी।

धर्मांतरण की यह संख्या दिखाती है कि अमेरिका में 11 सितंबर और लंदन में सात जुलाई को हुए हमलों का धर्मांतरण पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ा है।

ब्रिटेन के प्रमुख अखबार द इंडिपेंडेंट के अनुसार इस सर्वेक्षण में 2001 के स्कॉटिश जनगणना के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया। सर्वेक्षण में शामिल लोगों से यह पूछा गया कि जन्म के समय उनका धर्म क्या था और अब उनका धर्म क्या है। इसके अलावा शोधकर्ताओं ने लंदन के मस्जिदों का निरीक्षण कर यह पता किया कि एक साल के भीतर धर्मांतरण की कितने मामले होते हैं। मस्जिदों में पिछले एक साल के भीतर धर्मांतरण की संख्या 1400 के आसपास थी। इसके आधार पर पूरे देश में होने वाले धर्मांतरण की संख्या निकाली गई जो करीब 5200 थी।

लोक व सुफी गायकी का पर्याय हैं फकीरा खान

Posted by Indian Muslim Observer | 28 December 2010 | Posted in

चंदनसिंह भाट्टी

बाड़मेर: पश्चिमी राजस्थान की धोरा धरती की कोख से ऐसी प्रतिभाएं उभर कर सामने आई हैं, जिन्होंने ‘थार की थळी’ का नाम सात समंदर पार रोशन कर लोक गायिकी को नए शिखर प्रदान किए हैं। इसी कड़ी में एक अहम नाम है-फकीरा खान। लोक गायकी में सुफियाना अन्दाज का मिश्रण कर उसे नई उंचाईयां देने वाले लोक गायक फकीरा खान ने अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर अपना एक मुकाम बनाया है।

राजस्‍थान के सीमावर्ती बाड़मेर जिले के छोटे से गांव विशाला में सन 1974 को मांगणियार बसर खान के घर में फकीरा खान का जन्‍म हुआ था। उनके पिता बसर खान शादी-विवाह के अवसर पर गा-बजाकर परिवार का पालन-पोषण करते थे। बसर खान अपने पुत्र को उच्च शिक्षा दिलाकर सरकारी नौकरी में भेजना चाहते थे ताकि परिवार को मुफलिसी से छुटकारा मिले, मगर कुदरत को कुछ और मंजूर था।

आठवीं कक्षा उर्तीण करने तक फकीरा अपने पिता के सानिध्य में थोड़ी-बहुत लोक गायकी सीख गए थे। जल्दी ही फकीरा ने उस्ताद सादिक खान के सानिध्य में लोक गायकी में अपनी खास पहचान बना ली। उस्ताद सादिक खान की असामयिक मृत्यु के बाद फकीरा ने लोक गायकी के नये अवतार अनवर खान बहिया के साथ अपनी जुगलबन्दी बनाई। उसके बाद लोक गीत-संगीत की इस नायाब जोड़ी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्‍होंने लोक संगीत की कला को सात समंदर पार ख्याति दिलाई। फकीरा-अनवर की जोड़ी ने परम्परागत लोक गायकी में सुफियाना अन्दाज का ऐसा मिश्रण किया कि देश-विदेश के संगीत प्रेमी उनके फन के दीवाने हो गए। फकीरा की लाजवाब प्रतिभा को बॉलीवुड़ ने पूरा सम्मान दिया।

फकीरा ने ‘मि. रोमियों’, ‘नायक’, ‘लगान’, ‘लम्हे’ आदि कई फिल्मों में अपनी आवाज का जलवा बिखेरा। फकीरा खान ने अब तक उस्ताद जाकिर हुसैन, भूपेन हजारिका, पं. विश्वमोहन भट्ट, कैलाश खैर, ए.आर. रहमान, आदि ख्यातिनाम गायकों के साथ जुगलबंदियां देकर अमिट छाप छोडी। फकीरा ने 35 साल की अल्प आयु में 40 से अधिक देशों में हजारों कार्यक्रम प्रस्तुत कर लोक गीत-संगीत को नई उंचाइयां प्रदान की। फकीरा के फन का ही कमाल था कि उन्‍होंने फ्रांस के मशहूर थियेटर जिंगारो में 490 सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत कर राजस्थान की लोक कला की अमिट छाप छोड़ी।

फकीरा ने अब तक पेरिस, र्जमनी, स्विट्जरलैंड, ऑस्ट्रिया, फ्रांस, इजरायल, यू.एस.ए बेल्जियम, हांगकांग, स्पेन, पाकिस्तान सहित 40 से अधिक देशों में अपने फन का प्रदर्शन किया। मगर, फकीरा राष्‍ट्रीय पर्व गणतंत्र दिवस पर वर्ष 1992, 93, 94, 2001, 2003 तथा 2004 में नई दिल्‍ली के परेड ग्राउंड में दी गई अपनी प्रस्तुतियों को सबसे यादगार मानते हैं।

फकीरा खान ने राष्‍ट्रीय स्तर के कई समारोहों में शिरकत कर लोक संगीत का मान-सम्मान बढ़ाया है। उन्होंने समस्त आकाशवाणी केन्द्रों, दूरदर्शन केन्द्रों, डिश चैनलों पर अपनी प्रस्तुतियां दी हैं।

फकीरा खान ने सितम्बर 2009 में जॉर्डन के सांस्कृतिक मंत्रालय द्वारा आयोजित ‘द सुफी फेस्टिवल’ में अपनी लोक गायिकी से धूम मचा दी। उनके द्वारा गाये राजस्थान के पारम्परिक लोक गातों के साथ सुफियाना अन्दाज को बेहद पसंद किया गया।

फकीरा लोक गीत-संगीत की मद्धम पड़ती लौ को जिलाने के लिए मांगणियार जाति के बच्चों को पारम्परिक जांगड़ा शैली के लोक गीतों, भजनों, लोक वाणी और सुफियाना शैली का प्रशिक्षण देकर नई पौध तैयार कर रहे हैं। फकीरा ने हाल में ही ‘वर्ल्‍ड म्यूजिक फैस्टिवल’, शिकागो द्वारा आयोजित 32 देशों के 57 ख्यातिनाम कलाकारों के साथ लोक संगीत की प्रस्तुतियां दे कर परचम लहराया। फकीरा खान को ‘दलित साहित्य अकादमी’ द्वारा सम्मानित किया गया। राज्य स्तर पर कई मर्तबा समानित हो चुके फकीरा खान के अनुसार, लोक संगीत खून में होता है, घर में जब बच्चा जन्म लेता है और रोता है, तो उसके मुंह से स्वर निकलते हैं।

उनके अनुसार, लोक गीत संगीत की जांगड़ा, डोढ के दौरान लोक-कलाकारों के साज बाढ में बह गए थे। फकीरा खान ने खास प्रयास कर लगभग दो हजार लोक कलाकारों को सरकार से निःशुल्क साज दिलाए।

(Email::tharpress@live.com)

विकास से दूर है देश के अल्पसंख्यक बाहुल्य 90 जिले

Posted by Indian Muslim Observer | 17 December 2010 | Posted in , ,

ज्ञानेन्द्र सिंह / एसएनबी


अल्पसंख्यकों के हितों और विकास के तमाम दावों की पोल खोलते हुए भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएसएसआर) की एक रिपोर्ट ने देश की चार राज्यों की राजधानियों सहित देश के अल्पसंख्यक बाहुल्य 90 जिलों में अपर्याप्त विकास कार्य होने का खुलासा किया है। राष्ट्रीय औसत से कम विकासवाले इन जिलों में देश की राजधानी दिल्ली का भी एक जिला शामिल है।

बहरहाल, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की सिफारिश पर शहरी विकास मंत्रालय ने इन जिलों के विकास की गति तेज कर दी है। कोलकाता, लखनऊ, भोपाल और रांची सहित देश के अल्पसंख्यक बाहुल्य 90 जिलों के विकास में कमी और खामी बताने वाली आईसीएसएसआर रिपोर्ट के बाद अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय हरकत में आ गया है।

इस रिपोर्ट ने उन तमाम विकास कार्यो के नतीजों की भी पोल खोली है जिसके तहत अरबों-खरबों रुपए खर्च किए जाते रहे हैं। उसी का नतीजा है कि जब देश के चार राज्यों की राजधानी और राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का एक जिला आज भी विकास के पैमाने में अधूरा है। अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय की पहल के बाद शहरी विकास मंत्रालय ने इन जिलों को राष्ट्रीय औसत मानदंडों के तहत विकसित करने की तमाम परियोजनाएं शुरू कर दी हैं।

विकास कार्यो के लिहाज से अविकसित जिलों को तीन वर्गो में बांटा गया है। सन 2001 की जनगणना में पिछड़ेपन के मानकों और अल्पसंख्यक आबादी संबंधी आंकड़ों के आधार पर घोषित किए गए देश के अल्पसंख्यक बाहुल्य 90 जिलों में कराए गए एक सव्रेक्षण की रिपोर्ट यह बताने के लिए भी पर्याप्त है कि अल्पसंख्यकों के हितों की बात करनेवाले राजनीतिक दलों की सरकारों ने वास्तव में उनके लिए क्या किया है। इस रिपोर्ट को अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय ने गंभीरता से लेते हुए आवास, स्वास्थ्य, पेयजल, शिक्षा एवं कौशल शिक्षा, रोजगार सृजन व सौर ऊर्जा के क्षेत्र की परियोजनाओं को शुरू करवा दिया है।

अल्पसंख्यक कार्य मंत्री सलमान खुर्शीद की जानकारी के मुताबिक, सामाजिक, आर्थिक एवं आधारभूत सुविधाओं के आधार पर 20 राज्यों के 53 जिलों को पहले वर्ग में रखा गया है जिसमें उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर, बदांयू, बाराबंकी, खीरी, शाहजहांपुर, मुरादाबाद, रामपुर, ज्योतिबाफूले नगर, बरेली, पीलीभीत, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर, बिजनौर व बिहार के किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, सीतामढ़ी, पश्चिम चंपारण, दरभंगा व अररिया हैं। दूसरे वर्ग में दिल्ली का नार्थ-ईस्ट, उत्तर प्रदेश के लखनऊ, सहारनपुर, मेरठ, मुजफ्फरनगर, बागपत व गाजियाबाद, उत्तराखंड के उधमसिंह नगर व हरिद्वार, झारखंड की राजधानी रांची, मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल व पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता शामिल हैं।

बहरहाल, विकास के लिए अब उक्त जिलों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, प्रसूति गृह, इंदिरा आवास योजना के मकान, आंगनवाड़ी केंद्रों के निर्माण, स्कूलों व चालू विद्यालयों के विस्तार, हैड पंपों व कुओं के निर्माण, इंटर कालेजों के निर्माण, आईटीआई व पालिटेक्निक भवनों के निर्माण, रोजगार व ग्राम स्व रोजगार योजना के तहत कई काम किए जाएंगे।

कश्मीर मामले में भारत सच्चाई का सामना करने से क्यों डरता है ?

Posted by Indian Muslim Observer | 08 November 2010 | Posted in

सलमान अहमद 

इस में कोई शक नहीं के भारत एक शक्तिशाली देश बनकर उभर रहा है लेकिन ये भी एक सच्चाई है के एक शक्तिशाली मुल्क के अन्दर हकीकत को कुबूल करने की जो इच्छा शक्ति होनी चाहिए भारत उससे अभी कोसो दोर है । कश्मीर के मामले में भी हमारी यानि भारत की कुछ ऐसी ही पॉलिसी है के वोह कश्मीर की सच्चाई तो जनता है लेकिन उस सच्चाई का सामना करने से डरता है । अफ़सोस की बात ये है के हमारे देश यानि भारत का अक्सर मीडिया भी सच्चाई से आँखें चुराता है। सब से जियादा तकलीफ की बात ये है के जो कोई सच बोलने की की हिम्मत करता है उसपर देश दुरोही होने का इलज़ाम लगाया जाता है। मुझे भी डर लग रहा है के कहीं सच बोलने के जुर्म में देश दुरोही का इलज़ाम ना लग जाये, लेकिन किया करों सच बोले बगैर रहा भी नहीं जाता है इसलिए के झोट बोलकर ज़ख्म को छुपाने से कोई फ़ायदा नहीं होता बलके उलटा नुकसान होता है इसलिए हम चाहते है के ज़ख्म को छुपाने के बजाये उसका इलाज किया जाये ताके हमारी आने वाली नस्ल अमनो सुकों के साथ विकास और तरक्की के रस्ते पर चलती रहे।


आज मैं बात करने जारहा हूँ कश्मीर की, उस कश्मीर की बात जो न जाने कबसे सुलग रहा है। कब तक सुलगेगा, इसका क्या इलाज है।


इन सब सवालों पर लोगों और दलों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं। लेकिन एक मुद्दे पर सबके विचार एक हैं, या कम से कम मुझे लगता है कि एक हैं – कि कश्मीरी अपनी इच्छा से भारत के साथ नहीं रहना चाहते। मैं यह नहीं कह रहा कि वे पाकिस्तान के साथ रहना चाहते हैं। मेरी समझ यह है, और सारे पोल भी यही कह रहे हैं कि वे अलग रहना चाहते हैं।

अभी कुछ महीने पहले लंदन के चैटम हाउस की तरफ से दोनों कश्मीरी भागों में एक ओपिनियन पोल कराया गया था। पोल का नतीजा यह था कि दोनों तरफ के कश्मीरी न तो भारत के साथ रहना चाहते थे न ही पाकिस्तान के साथ। ज्यादातर आज़ादी चाहते हैं। पोल के मुताबिक कश्मीरी घाटी में ऐसा चाहनेवालों की संख्या 74 से 95 प्रतिशत थी।

यह पोल 2010 में यानी इसी साल कराया गया था। इससे पहले 1995 में आउटलुक मैगज़ीन ने अपने पहले अंक में ही कश्मीरियों का मन जानने के लिए एक ओपिनियन पोल कराया था। उसका नतीज़ा भी यही था – 72 प्रतिशत कश्मीरी भारत के साथ नहीं रहना चाहते। यानी 15 सालों में कश्मीर के हालात वैसे ही हैं। आप उनका मन नहीं बदल पाए। सच तो यह है कि आपने कभी भी उनका मन जानने की कोशिश ही नहीं की। अगर जानने की कोशिश की होती तो आज वे हमारे साथ होते और बिना किसी शिकायत के होते।

1947 में भारत-पाक बंटवारा हुआ। तय यह था कि हिंदू-बहुल प्रांत भारत में और मुस्लिम-बहुल सूबे पाकिस्तान के हिस्से में जाएंगे। रजवाड़ों को यह आज़ादी दे दी गई थी कि वे चाहे भारत में मिलें, चाहे पाकिस्तान में या फिर स्वतंत्र रहें। जम्मू-कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह ने पहले पाकिस्तान से सौदेबाजी की कोशिश की लेकिन जो वह चाहते थे, वह सब उनको देने पर पाकिस्तानी हुकूमत राजी नहीं हुई। इस के बाद राजा हरि सिंह ने भारत से संपर्क किया। भारत ने मदद की हामी तो भरी लेकिन साथ यह शर्त जोड़ दी कि राजा हरि सिंह पहले जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ विलय की संधि पर दस्तखत करें। इसके बाद राजा ने अक्सेशन ट्रीटी पर दस्तखत करके कश्मीर को भारत में मिलाने का करार किया।

इस सारे प्रोसेस में गड़बड़ यह थी कि जब सारा भारत-पाक बंटवारा ही सांप्रदायिक आधार पर हो रहा था, तब एक मुस्लिम-बहुल राज्य भारत के साथ मिलाया जा रहा है बिना इस बात की पड़ताल किए कि वहां के लोग क्या चाहते हैं। कोई भी तब यह निष्कर्ष निकाल सकता था कि कश्मीरी मुसलमान भारत के साथ नहीं रहना चाहते थे और एक हिंदू राजा ने अपने हित में अपनी रियासत को भारत से मिलाने का करार कर दिया। स्थिति इसलिए और भी जटिल थी कि हैदराबाद और जूनागढ़ के मामले में तब की भारत सरकार का स्टैंड बिल्कुल अलग था। हैदराबाद के निजाम और जूनागढ़ के नवाब अपने इलाकों को भारत के साथ नहीं मिलाना चाहते थे, लेकिन भारत सरकार ने उनकी एक नहीं चलने दी।

तब के प्रधानमंत्री नेहरू जानते थे कि कश्मीर के मामले में भारत का स्टैंड अंतरराष्ट्रीय मंच पर ठहर नहीं पाएगा क्योंकि कश्मीर में एक बात और हैदराबाद और जूनागढ़ में दूसरी बात नहीं चल सकती। नेहरू कभी भी इस बात को नहीं मान सकते थे कि कोई राज्य सिर्फ इसलिए भारत के साथ रहे कि उसका राजा यह चाहता है। इसीलिए उन्होंने यूएनओ को भरोसा दिलाया कि हम कश्मीरियों से जबरदस्ती नहीं कर रहे और हम जल्द से जल्द उनकी इच्छा जानने के लिए जनमतसंग्रह करेंगे। लेकिन बाद में यह मामला उलझ गया क्योंकि पाकिस्तान की मांग थी कि जनमतसंग्रह यूएन की देखरेख में हो और जनमतसंग्रह से पहले पूरे इलाके से बाहरी फौजें जिनमें भारतीय फौजें भी शामिल थीं पूरी तरह से हटाई जाएं। भारत इसके लिए तैयार नहीं था। मामला वहीं लटका रहा। इस बीच काफी घटनाएं हुईं। 1952 में शेख अब्दुल्ला के साथ दिल्ली अग्रीमेंट साइन हुआ लेकिन एक साल बाद वही शेख अब्दुल्ला गिरफ्तार कर लिए गए। शेख के जेल में रहते-रहते 1954 में कश्मीर की संविधान सभा से भारत के साथ मर्जर का अनुमोदन करवा दिया गया और भारत की तरफ से जनमतसंग्रह का मामला हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया।

लेकिन इससे नुकसान यह हुआ कि पाकिस्तान को यह मुद्दा भी हमेशा-हमेशा के लिए मिल गया कि कश्मीरियों से तो आपने कभी पूछा ही नहीं। वह हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह मुद्दा उठाता रहता है और हमारे पास बगलें झांकने और यह रटा-रटाया वाक्य बोलने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं है कि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अभिन्न हिस्सा है। लेकिन इस वाक्य का तब कोई मतलब नहीं रह जाता जब कोई देश हमसे पलटकर यह पूछ बैठता है - अगर जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो क्या 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) पाकिस्तान का अभिन्न अंग नहीं था? उसकी आज़ादी में आपने क्यों मदद की?


मेरी ये बातें बहुत सारे लोगों को सख्त ज़रोर लग रही होंगी और कुछ लोगों के गले से नीचे भी नहीं उतर रही होंगी लेकिन सच्चाई को हर हाल में कुबूल करनी चहिये चाहे वोह कितनी ही कडवी क्यिओं ना हो, जो लोग सच्चाई को अपनी मर्ज़ी से कुबूल नहीं करते उन्हें वक़्त और हालात कुबूल करने के लिए मजबूर कर देते हैं ।


रखियो ग़ालिब मुझे इस तल्ख़ नवाई से मुआफ /
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सवा होता है /


(Email: salmanahmed70@yahoo.co.in)

भारतीय मुसलमानों को करनी होगी अपनी जिम्मदारियों की पहचान, अपनी मदद आप से ही बच पायेगी की छबि

Posted by Indian Muslim Observer | 02 November 2010 | Posted in


सलमान अहमद


मुख्तलिफ लोगों ने अपने हिसाब से भारतीय मुसलमानों की मुख्तलिफ छबियां बनाई हैं।


इनमें से ज्यादातर छवियां मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित हैं। उदाहरण के तौर पर भारत के जाने-माने अंग्रेजी लेखक खुशवंत सिंह के मत में एक सामान्य मुसलमान वह है जिसके 8-10 बच्चे होते हैं, वह बनियान-लुंगी पहन कर गली-मुहल्ले के नुक्कड़ पर पान की पीक थूकता नजर आएगा। एक अन्य लेखिका तवलीन सिंह के विचार में एक सामान्य मुसलमान रूढ़िवादी होता है।


अमेरिका और कुछ बड़े मीडिया घरानों की मुसलमानों के बारे में यह धारणा है कि वे सभी बिन लादेन, बाबर, मुल्ला उमर, मौलाना मसूद अजहर और इनके द्वारा प्रचारित आतंकवाद की हिमायत करने वाले हैं। संघ परिवार के लोग तो मुसलमानों की तुलना गद्दारों से करते हैं और उन्हें देशभक्त नहीं मानते।


मीडिया का ही एक हिस्सा एक आम मुसलमान के बारे में ऐसा मानता है कि वह भोजन में नमक अधिक होने पर, पत्नी के साड़ी पहन लेने पर, किसी बात पर जरा सा गुस्सा आने पर उसे तुरंत प्रताड़ित कर तलाक दे देता है। वह परिवार नियोजन में विश्वास नहीं रखता, घेटो (एक अलग-थलग बस्ती) में रहने वाले लोगों जैसी मानसिकता रखता है, आधुनिक शिक्षा से दूर रहता है, वंदे मातरम् का विरोध करता है, बाबरी मस्जिद के पुनर्निर्माण, सलमान रश्दी, तस्लीमा नसरीन के चक्रव्यूह में फंसा रहता है। मुसलमानों की एक और छवि यह बनाई गई है कि वे अपनी अंधेरी, बदबूदार, जर्जर बस्तियों में रहना पसंद करते हैं। उनके बच्चे गलियों की कीचड़-मिट्टी में लोटते रहते हैं और गुल्ली-डंडा या प्लास्टिक की गेंद से क्रिकेट खेलते रहते हैं। मुसलमानों के बारे में मीडिया की बनाई गई छवियों में से एक छवि यह है कि वे अपनी औरतों और बच्चियों को आधुनिक तो क्या, प्राचीन शिक्षा भी देना पसंद नहीं करते है। वे औरतों को अपने समाज में कोई हक नहीं देते, जिससे मुस्लिम महिलाएं लाचारी का जीवन बिताती हैं। मुस्लिम पुरुष जब चाहते हैं, तब शादी कर लेते हैं और जब चाहते हैं तलाक भी दे देते हैं और यह नहीं सोचते कि तलाक देने से उस औरत का क्या होगा।


इसके अलावा मुसलमानों की एक और छवि यह है कि वे तालिबान, अरब देशों जैसे फलस्तीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात आदि के गुणगान में लगे रहते हैं, जबकि इन देशों को भारतीय मुसलमानों से कोई लेना-देना नहीं। आम मुसलमानों के बारे में एक छवि भारत के विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा बनाई गई है। इनके अनुसार सभी मुसलमान अल्पसंख्यकवादी हैं और वे चुनाव में मुस्लिम प्रत्याशी को ही वोट देते हैं। यह भी माना जाता है कि मुसलमान धर्म के आधार पर मतदान करते हैं ।


सचाई यह है कि इन सभी छवियों में से मुसलमान की एक भी छवि नहीं है। मुसलमान की बस एक ही छवि है कि वह टूट कर इस्लाम को चाहने वाला होता है, अपने रसूल से बेपनाह मुहब्बत करता है और अपने धर्म, रसूल पर किसी भी समय मर-मिटने के लिए तैयार रहता है। पर एक सही बात यह भी है कि इन बनी-बनाई छवियों के आधार पर भारत में बसे मुसलमानों का आकलन नहीं हो सकता।


जब देश का विभाजन हो रहा था तो उस समय भारत के बहुलतावादी समाज के समर्थक स्वतंत्रता सेनानी मौलाना अबुल कलाम आजाद ने जामा मस्जिद की सीढ़ियों से एक ऐसा भाषण दिया था कि पाकिस्तान जाने वाले अनेक लोगों ने अपने बिस्तरबंद खोल दिए थे और मौलाना के इस शेर पर लब्बैक कहा था 'जो चला गया उसे भूल जा, हिंद को अपनी जन्नत बना।'


पर यहां रुक जाने और इस वतन को अपना मानने के बावजूद भारतीय मुसलमान को शक की नजर से क्यों देखा जाता रहा है? इसका जवाब किसी के पास नहीं है


मुसलिम नेताओं और मुल्क की खतरनाक राजनीती के कारण भी आज मुसलमान इतने पिछड़े हुए हैं। अगर मुस्लिम नेता ईमानदारी से अपने समुदाय के नेतृत्व की बागडोर संभालते तो आज मुसलमानों की तुलना समाज के सबसे पिछड़े वर्गों से नहीं होती। एक तो अपने नेताओं की उपेक्षा और दोसरी तरफ मुस्लिम मुखालिफ वातावरण, इन दोनों वजहों से भारतीय मुसलमानों में खीझ बढ़ती गई और वे मुख्य धारा से दूर खिंचते चले गए। इन सारी वजहों के नतीजे में आज भारत का मुसलमान बिखरा-बिखरा सा नजर आता है।


भारतीय मुसलमानों को एक सामान्य मनुष्य व देश के अन्य नागरिकों के समान अधिकारों की मांग और जिम्मेदारियों की पहचान करनी होगी। साथ ही दूसरे धर्मों-समुदायों के लोगों के साथ समानता पर आधारित तालमेल बिठाने की गुंजाइश पैदा करनी होगी, वरना बहुत देर हो जाएगी ।


भारत जिस तेज़ी से आगे बढ़ रहा है और तरक्की कर रहा है उस तरक्की का भाग्यादर बन्ने की लिए भारतीय मुसलमानों को अब जागना होगा, किसी दोसरे पर भरोसा करने के बजाये अपने आप पर भरोसा करना होगा, दोसरे से मदद की उम्मीद छोड़ कर अपनी मदद आप करनी होगी, इस लिये के दुनिया की तारिख में वही कौमें कामियाब होती हैं जो अपनी मदद आप करना जानती हैं। 

(Email: salmanahmed70@yahoo.co.in)

आईआईटी रुड़की में लड़कियों की इज्ज़तें नीलाम, परदे के खेलाफ़ चिल्लाने वाला मीडिया कियों है खामोश?

Posted by Indian Muslim Observer | | Posted in

सलमान अहमद

कहते हैं सिक्षा जानवरों को भी अक़लमंद और समझदार बनादेती है लेकिन आज हालत ये होगई है के हमारे मुल्क की कुछ जनि मणि सिक्षा की संथाएं इंसानों को बेशर्म जानवर बनाने का काम कर रही हैं । और सबसे जियादा अफ़सोस की बात ये हैं के बुर्के और परदे के खेलाफ़ आसमान को सर पे उठा लेने वाला मीडिया बिलकुल खामूश है।

आईआईटी रुड़की में एक लिपिस्टिक लगाने के आयोजन ने हमारी संस्कृति को शर्मसार कर दिया है। आईआईटी रुड़की जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में सांस्कृतिक कार्यक्रम थॉम्सो-10 के दौरान की गई हरकत शर्मनाक ही कही जाएगी। इससे संस्थान की प्रतिष्ठा को तो ठेस पहुंची ही, छात्र-छात्राओं के बीच गरिमापूर्ण संबंधों की अपेक्षा को भी धक्का पहंुचा है। लिपिस्टिक लगाने के नाम पर की गई हरकतें अश्लीलता की हदें पार कर गई। ऐसे कार्यक्रमों पर लोगों की तीखी प्रतिक्रिया होनी स्वाभाविक ही है। रुड़की संस्थान प्रशासन अब आयोजकों को जिस तरह बचाने की कोशिशों में जुटा है, इससे उनके स्तर पर बरती गई लापरवाही साफ तौर पर नजर आ रही है। इसे इनफार्मल प्रोग्राम की श्रेणी में रखकर आईआईटी प्रशासन अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकता। ऐसे मामले में सख्ती बरतने की जरूरत है ताकि भविष्य में इस सबकी पुनरावृत्ति नहीं हो सके। इतना ही नहीं इससे दूसरे शिक्षण संस्थानों को भी सबक लेने की जरूरत है। उच्चकोटि की शिक्षण संस्थाओं पर सिर्फ विद्यार्थियों के कैरियर संवारने की जिम्मेदारी ही नहीं है, बल्कि उन्हें सभ्य और एक जिम्मेदार नागरिक बनाने की सीख देना भी उन्हीं की जिम्मेदारी है। इस तरह की शिक्षा उच्च स्तर पर भी दी जानी चाहिए। इसमें लापरवाही सांस्कृतिक संकट को तो जन्म देगी ही, अभिभावकों के बीच अविश्र्वास को भी गहरा करेगी। इस सबको कतई उचित नहीं ठहराया जा सकता, इसलिए संस्थान को इस बारे में आगे से सचेत रहने की जरूरत है। अभी यह कार्य सांस्कृतिक गतिविधि के हिस्से के रूप में हुआ। आगे चलकर यह रैगिंग अथवा फ्रेशर्स पार्टी का हिस्सा नहीं बने इस पर संस्थान को गंभीरता से मंथन करने की जरूरत है। लिहाजा इस मसले पर सिर्फ लीपापोती नहीं, बल्कि सख्ती से अंकुश लगाने की जरूरत है, वरना वोह दिन दूर नहीं जब सिक्षा के नाम पर लड़कियों की इज्ज़तों की नीलामी एक आम बात बन जाएगी और बड़ी संथाओं में पढने वाली शायेद ही कोई लड़की अपनी आब्रो बचा पायेगी।

(Email: salmanahmed70@yahoo.co.in)

कश्मीर पर सियासत करने वाले पाकिस्तान के नाम, हिन्दुस्तानी मुसलमान का पैग़ाम

Posted by Indian Muslim Observer | 01 November 2010 | Posted in

सलमान अहमद

वतने पाक के बाज़र्फ़ सियासतदानों
कौम ओ मिल्लत के तरफ दार हसीं चारा गरो

ज़ुल्म कश्मीर के मजलूमों पे जब होता है
इन का ग़म देख कर तुम लोगों का दिल रोता है?

तुम ने इन लोगों की बेलोस हिमायत की है?
इन की उजड़ी हुई नस्लों से मुहब्बत की है?

ये इनायत ये करम क्यों है ज़रा ये भी कहो?
तुम को इन लोगों का ग़म क्यों है ज़रा ये भी कहो?

क्या इन्हें देख के तुम वाकई रंजीदा हो?
इन की खुशियों के लिए वाकई संजीदा हो?

तुम जो हो कौम के हमदर्द तो आगे आओ ?
एक मुद्दत की जो उलझन है उसे सुलझाओ?

आँख इस पार उठाना ही जवान मरदी है?
तुम को सरहद के इधर वालों से हमदर्दी है?

किया उधर साहिबे ईमान नहीं रहते हैं?
क्या कराची में मुस्लमान नहीं रहते हैं ?

तुम ने कश्मीर के जलते हुए घर देखे हैं
और बच्चों के भी कटते हुए सर देखे हैं

ज़ुल्म कश्मीर या गुजरात में जो होता है
ये तो अपने नहीं ग़ैरों का सितम होता है

लेकिन जब भाई ही भाई का लहो पिता है
दर्द ग़ैरों के मुकाबिल में बहुत होता है

अपने घर का तुम्हें माहोल दिखाई न दिया?
अपने कूचे का तुम्हें शोर सुनाइ न दिया?

अपनी बस्ती की तबाही नहीं देखि तुम ने ?
उन फिजाओं की सियाही नहीं देखि तुमने ?

मस्जिदों में भी जहाँ कतल किया जाता है
भाइयों का भी जहाँ खून किया जाता है

लूट लेता है जहा भाई बहन की इस्मत
और पामाल जहाँ होती है मां की अज़मत

एक मुद्दत से मुसाफिर का लहू बहता है
अब भी सड़कों पे मुहाजिर का लहू बहता है

मारे जाते हैं वहां जो मेरे अजदाद हैं वो
मादरे हिंद की बिछड़ी हुई औलाद हैं वो

मारते हो जिसे तुम वोह तो मुस्लमान ही हैं
वोह तुम्हारी ही तरह साहिबे ईमान ही हैं

कौन कहता है मुसलमानों के ग़म ख्वार हो तुम?
दुश्मने अमन हो इस्लाम के ग़द्दार हो तुम

तुम को कश्मीर के मजलूमों से हमदर्दी नहीं
किसी बेवा किसी मासूम से हमदर्दी नहीं

तुम में हमदर्दी का जज्बा जो ज़रा सा होता
तेरे हाथों से मुसलमानों का खों ना बहता

और कराची में कोई जिस्म न ज़ख्मीं होता
खौफ के साये में हर शख्स ना ऐसे सोता

लाश की ढेर पे बुनियादे हुकूमत न रखो
अब भी है वक़त के ना पाक इरादों से बचो

मशवरा यह है के पहले वहीँ इमदाद करो
और कराची की गली कूचों को आबाद करो

जब वहां प्यार के सूरज का उजाला हो जाए
और हर शख्स तुम्हें चाहने वाला हो जाए

फिर किसी की भी तरफ चश्मे इनायत करना
फिर तुम्हें हक है किसी की भी हिमायत करना

और गर अपने यहाँ तुम ने सितम कम ना किया
अपनी धरती पे जो खुर्शीद को शबनम ना किया

तो कभी चैन से तुम भी नहीं रह पाओगे
अपनी भड़काई हुई आग में जल जाओगे

मस-अला कश्मीर का तो आज ना कल हल होगा
लेकिन तेरा ना कहीं उसमें कुछ दखल होगा

(Email: salmanahmed70@yahoo.co.in)

प्रधानमंत्री ने कहा इसलामिक बैंक से सीख ले रिजर्व बैंक

Posted by Indian Muslim Observer | 29 October 2010 | Posted in

इस्लामिक बैंकिंग का जादो सर चढ़ के बोला

एजेंसी

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा है कि रिजर्व बैंक को मलयेशिया में इसलामिक बैंकिंग व्यवस्था से सीख लेनी चाहिए। रिजर्व बैंक पर भारत में इस तरह की व्यवस्था शुरू करने का दबाव है। मालूम हो कि इसलामिक बैंकिंग ब्याज मुक्त बैंकिंग व्यवस्था है। यह पूछे जाने पर कि क्या भारत मलयेशिया में इसलामिक बैंकिंग से कुछ सीख लेना चाहेगा मनमोहन ने कहा, इसलामिक बैंकिंग के प्रयोग को लेकर समय-समय पर मांग उठती रही है। मैं निश्चित तौर पर रिजर्व बैंक से सिफारिश करूंगा कि मलयेशिया में इस संबंध में क्या हो रहा है, वह इस पर नजर डाले। मलयेशिया के दौरे पर कुआलालंपुर पहुंचे मनमोहन ने इससे पहले मलयेशियाई प्रधानमंत्री मोहम्मद नजीब तुन अब्दुल रज्जाक के साथ आर्थिक एवं रणनीतिक मामलों पर विस्तृत बातचीत की।

इसलामिक बैंकिंग एक तरह की ब्याज मुक्त बैंकिंग व्यवस्था है और देश में इसलामिक बैंकिंग की अनुमति से मध्य पूर्व के देशों से अरबों डालर का निवेश आ सकता है। इस समय दुनिया भर में करीब 400 से 500 इसलामिक बैंकों द्वारा 1,000 अरब डॉलर की परिसंपत्तियों का प्रबंधन किया जा रहा है और 2020 तक यह आंकड़ा 4,000 अरब डालर पहुंचने का अनुमान है। हाल ही में मध्य पूर्व के एसएनआर डेंटॉन ऐंड कंपनी के पार्टनर और इसलामिक फाइनेंस के प्रमुख एम सिद्दीकी ने भारत सरकार से पायलट योजना के आधार पर ब्याज मुक्त बैंकिंग व्यवस्था शुरू करने की अपील की थी। उन्होंने कहा कि इस मसले पर हम रिजर्व बैंक के अधिकारियों के संपर्क में हैं।

दहशतगर्दी के असल चेहरे हो रहे हैं बेनेकाब, देश भक्ति के नाम पर हो रहा था आतंकबाद का नंगा नाच

Posted by Indian Muslim Observer | 28 October 2010 | Posted in

सलमान अहमद

मुल्क में जब भी कोई आतंकबादी हमला हुआ उसका इलज़ाम मुसलमानों के सर थोप दिया , लेकिन जब हकीकत सामने आई तो उन आतंकबादी हमलों के पेछे ऐसे लोगों का हाथ नज़र आया जो अपने इलावा किस दोसरे को देश भक्त समझते ही नहीं हैं ।

अगर आरंभ में ही यह कदम उठा लिये जाते तो देश को जिन आतंकवादी हमलों का सामना करना पड़ा, शायद उनसे बच जाते। बहरहाल आज के इस संक्षिप्त लेख में मैं अपने पाठकों तथा भारत सरकार के सामने थोड़े शब्दों में वे घटनायें सामने रखना चाहता हूं , जिन से बार-बार हमारे देश को जूझना पड़ा। अभी चर्चा केवल उनकी जिनकी जांच का निष्कर्ष सामने आ गया है या आता जा रहा है। हो सकता है शेष घटनाओं की भी नये सिरे से छान बीन हो तो ऐसा ही कुछ सामने आये। यह कुछ मिसाले इसलिए कि हमारी सरकारी और खुफिया एजेंसियां अंदाजा कर सकें कि उन बम धमाकों के बाद किन लोगों को संदेह के आधार पर गिरफ्तार किया गया था और जब सच सामने आया तो किनके चेहरे सामने आये।

मालेगांव धमाके õ1
(8 सितम्बर 2006)
37 हताहत
आरम्भ में जो व्यक्ति गिरफ़्तार हुए, वे सल्मान फ़ारसी, फ़ारुक़ अब्दुल्ला मख़दूमी, रईस अहमद, नूरुलहुदा, शम्सुलहुदा, शब्बीर बीड़ी वाले।
बाद की जांचः 2008 के मालेगांव बम धमाकों में हिन्दू आतंकवादियों के सामने आने के बाद अन्य मामलों में भी शक की सूई भी हिन्दू आतंकवादियों पर ही गई।

समझौता एक्सप्रेस बम धमाका
18 फ़रवरी 2007
68 हताहत, अधिकतर पाकिस्तानी नागरिक
आरम्भिक जांच में लश्कर तथा जैश -ए -मुहम्मद पर आरोप लगाया गया और इस सिलसिले में पाकिस्तानी नागरिक अज़मत अली को गिरफ़्तार किया गया।
बाद की जांच में सामने आया कि इन घटनाओं के पीछे हिन्दू आतंकवादी हो सकते हैं। इन धमाकों में जो पद्धति प्रयोग की गई है वह मक्का मस्जिद के धमाकों से मिलती हुई है। इस मामले में पुलिस को आर.एस.एस के प्रचारक संदीप डांगे तथा रामजी के नाम सामने आये।

मक्का मस्जिद धमाका
18 मई 2007
14 व्यक्तियों की मृत्यु
आरम्भ में स्थानीय पुलिस ने 80 मुस्लिम युवकों को गिरफ़्तार किया और उनसे पूछताछ की गई, जिनमें से 25 व्यक्तियों को गिरफ़्तार कर लिया गया, कोई सबूत न मिलने पर इनमें से इब्राहीम जुनैद, शुऐब जागीरदार, इमरान खान तथा मौहम्मद अब्दुल हकीम इत्यादि को सम्मानपूर्वक बरी कर दिया गया।
बाद की जांच के बाद जो परिणाम सामने आया वह इस प्रकार है। 2010 में सीबीआई ने घोषणा की कि वह इस मामले में 2 अभियुक्तों के बारे में सही सूचना देने वालों को 10 लाख रु0 का इनाम देगी। फिर इस मामले में संदीप डांगे, राम चन्द्र कालसिंगा तथा लोकेश शर्मा को गिरफ़्तार किया गया।

अजमेर शरीफ़ धमाका
11 अक्तूबर 2007
3 हताहत
जैसा कि अधिकांश बम धमाकों के बाद होता रहा है। आरम्भ में हूजी, लश्कर पर धमाकों का आरोप लगाया गया तथा जिन लोगों को गिरफ़्तार किया गया वह भी मुसलमान ही थे, उनमें अब्दुल हफ़ीज़, शमीम, खशीउर्रहमान, इमरान अली शामिल थे।
806 पृष्ठों पर आधारित आरोप पत्र में जो राजस्थान एटीएस ने एडीश्नल चीफ़ जूडिशियल मजिस्ट्रेट की अदालत में दाखिल की है इसमें 5 अभियुक्तों के नाम डाले गए हैं। अभिनव भारत के देवेन्द्र गुप्ता, लोकेश शर्मा और चन्द्रशेखर हैं। यह पुलिस की हिरासत में हैं, जबकि संदीप डांगे तथा रामजी कालासांगा फ़रार बताये जाते हैं।

थाणे बम धमाका
4 जून 2008
हिन्दू जन जागृति समिति तथा सनातन संस्था इस धमाके के पीछे बताई जाती हैं और रमेश हनुमंत गडकरी और मंगेश दिनकर निकम गिरफ़्तार किये गए थे। इन धमाकों का उद्देश्य फ़िल्म ‘जोधा अकबर’ के प्रदर्शन के विरुद्ध विरोध जताना था।

कानपुर तथा नांदेड़ बम धमाके
अगस्त 2008
कानपुर में बजरंग दल के 2 सदस्यों राजीव मिश्रा, भूपेन्द्र सिंह बम बनाते समय धमाका होने से मारे गए थे। अप्रैल 2006 में एन राजकोंडवार और एच पानसे नांदेड़ में बम बनाते समय मारे गए थे, वे दोनों भी बजरंग दल के थे।

मालेगांव-2
29 सितम्बर 2008
7 हताहत
आरम्भ में कहा गया था कि इस धमाके में इंडियन मुजाहिदीन शामिल है परन्तु बाद में अभिनव भारत तथा राष्ट्रीय जागरण मंच के लिप्त होने की बात सामने आई। उसमें प्रज्ञा सिंह ठाकुर, कर्नल पुरोहित और स्वामी अम्बिकानंद देवतीर्थ (दयानंद पाण्डे) गिरफ़्तार हुए। यही वह बम धमाके थे जिनकी जांच शहीद हेमंत करकरे कर रहे थे और जिससे आतंकवादियों का वह चेहरा सामने आया जिसके बारे में पहले सोचा ही नहीं जाता था। लेकिन जैसे जैसे जांच आगे बढ़ती गई परतें खुलती र्गइं। अगर 26/11 के आतंकवादी हमले में हेमन्त करकरे शहीद न होते तो शायद आज आतंकवाद का यह सम्पूर्ण नेटवर्क हमारे सामने होता। फिर भी उनके जाने के बाद भी यह सिलसिला रूका नहीं है। अजमेर बम धमाके की जांच के परिणाम हमारे सामने है।

गोवा धमाका
16 अक्तूबर 2009
इस धमाके में जो 2 व्यक्ति मारे गए, वे सनातन संस्था के कार्यकर्ता थे, मरने वाले मालगोंडा पाटिल तथा योगेश नायक उस समय मारे गए थे जब वह विस्फ़ोटक पदार्थ लेकर स्कूटर से जा रहे थे और उसमें अचानक धमाका हो गया।
जिस समय नांदेड़, कानपुर तथा गोवा में बम बनाते या ले जाते हुए यह लोग हताहत हुए, अगर उसी समय हमारी खुफिया एजेंसियों तथा एटीएस ने मुसतैदी से काम लिया होता तो सम्पूर्ण नेटवर्क का पर्दाफाश हो सकता था या कम से कम किस मानसिकता के लोगों का कारनामा था और किस स्तर के लोग इन षड्यंत्रों में लिप्त हैं, यह सामने आ सकता था। बात केवल कुछ लोगों के पकड़े जाने या एक डायरी में कुछ नाम लिखे होने की नहीं है, बल्कि असल बात यह है कि आतंकवाद का यह सिलसिला थम क्यों नहीं रहा था? शायद इसलिए कि हमने इस दिशा मंे कभी सोचा ही नहीं था, जिस दिशा में आज न केवल सोचा जा रहा है, बल्कि कार्यन्वयन करने का प्रयास भी किया जा रहा है। निसंदेह 26 नवम्बर 2008 को हुआ आतंकवादी हमला अत्यंत विडम्बनापूर्ण तथा शर्मनाक था, लेकिन उसके बाद से अगर छोटे छोटे मामलों की चर्चा न कि जाये तो कहा जा सकता है कि लगभग पिछले दो वर्षों में देश किसी बड़े आतंकवादी हमले का शिकार नहीं हुआ। क्या इसका एक कारण यह भी है कि अब आतंकवाद में लिप्त वह चेहरे सामने आने लगे हैं।

क्या ग़रीबों और मज़्लोमों के अधिकारों की बात करने का मतलब देश दरोही होना है? सरकार से अरुंधति रॉय का सवाल

Posted by Indian Muslim Observer | 27 October 2010 | Posted in

अरुंधति का बयान

"मैं यह श्रीनगर से लिख रही हूं। आज के अखबार कह रहे हैं कि कश्मीर में दिए गए बयानों के लिए मुझे देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार किया जा सकता है। मैंने सिर्फ वही कहा है जो कश्मीर के लाखों लोग रोजाना कहते हैं। मैंने सिर्फ वहीं कहा है जो मैं और मुझ जैसे सैंकड़ों लेखक सालों से लिखते और कहते रहे हैं। वो लोग जिन्हें मेरे भाषणों को पढ़ने की फिक्र है जान जाएंगे कि मेरे शब्द सिर्फ न्याय की मांग है।''

मैंने कश्मीर के उन लोगों की बात कि है जो दुनिया में सेना के सबसे खौफनाक शासन में जी रहे हैं। मैंने कश्मीर के उन पंडितों की बात की है जो अपने जन्मस्थान से खदेड़ दिए जाने के बाद बेबसी का जीवन जी रहे हैं। मैंने कश्मीर में शहीद हुए उन दलित सिपाहियों की बात की हैं जिनकी कब्रें कूड़े पर बनाई गई हैं। मैंने कुड्डालोर में इन शहीदों के गांव की यात्रा की है और इनकी कब्रों की दुर्दशा देखी है। मैंने भारत के उन गरीब लोगों की बात की है जो कश्मीमिरी मुस्लमान होने की कीमत चुका रहे हैं और जो अब आतंक के साये में जीना सीख रहे हैं।

कल मैंने सोपियां की यात्रा की। दक्षिण कश्मीर में सेब उगाने वाला यह कस्बा पिछले साल आशिया और नीलोफर के रेप और कत्ल के बाद 47 दिन तक बंद रहा था। इन युवतियों के शव घर के करीब एक नाले में मिले थे। आज तक उनके कातिलों को अंजाम तक नहीं पहुंचाया जा सका है। मैंने निलोफर के पति और आशिया के भाई शकील से मुलाकात की। हमारे चारों तरफ खड़े लोगों की आंखों में गुस्सा और दुख साफ देखा जा सकता था। ये लोग न्याय मिलने की उम्मीद खो चुके हैं। मैं उन युवा पत्थरबाजों से भी मिली जिनकी आंखों के सामने गोलियां बरसती हैं। मैंने एक युवक के साथ यात्रा की जिसने मुझे बताया कि अनंतनाग जिले के उसके तीन किशोर दोस्तों को हिरासत में लिया गया और उनकी अंगुलियों के नाखून खींच लिए गए। पत्थर फेंकने की सजा देने के लिए।

अखबारों में कुछ लोगों ने मेरे खिलाफ लिखते हुए मुझ पर नफरत भरे भाषण देकर भारत को तोड़ने का आरोप लगाया है। लेकिन मैंने जो कहा है वो प्यार और सम्मान से लिखा है। ये मैंने इसलिए कहा है क्योंकि मैं नहीं चाहती की लोगों की हत्या हो, लड़कियों का बलात्कार हो, युवकों को हिरासत में लेकर उनके नाखून खींच लिए जाए। यह मैंने इसलिए कहा क्योंकि मैं ऐसा समाज चाहती हूं जो खुद को एक कह सके। शर्म है ऐसे राष्ट्र पर जिसे अपने लेखकों की आवाज बंद करनी पडे़। धिक्कार है ऐसे देश पर जहां न्याय की मांग करने वालों को जेल में ठूसने की धमकी दी जाती है जबकि धर्म के नाम पर हत्याएं करने वाले, घोटाले करने वाले, लुटेरे, बलात्कारी और गरीबों की खाल खींचकर अमीर बनने वाले खुलेआम घूमते हैं।''

अरुंधति रॉय
26 अक्टूबर
श्रीनगर

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