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समाजवाद का नया चेहरा: शाहिद सिद्धकी

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उत्तर प्रदेश के चुनावी रण में एक शख्स ने बेहतर चुनाव प्रबंधन और अपने संचार कौशल की बदौलत समाजवाद को बनाया उत्तर प्रदेश का सिरमौर। वो शख्स है शाहिद सिद्धकी।

धर्मेन्द्र साहू

अब जबकि समाजवादी पार्टी देश के सबसे बड़े प्रदेश की सिरमौर है ऐसे में राजनीतिक विशलेषक इस बात पर मंथन कर रहे हैं कि आखिर वे कौन सी वजह हैं जिसकी बदौलत पार्टी एक बार फिर उत्तर प्रदेश की सत्ता संभालने वाली है। वह भी उन परीस्थितियों में जबकि पार्टी के चेहरे के रूप में पहचान रखने वाले अमर सिंह पार्टी में नहीं रहे। चुनावों से पर्वू समाजवादी पार्टी के आलचकों की बातों पर गौर करें तो, “शायद पार्टी के चाणक्य माने जाने वाले अमर सिंह की अनुपस्थिति में ये चुनाव सपा के अंतिम चुनाव होंगे और सपा इतिहास में बदल जाएगी।”

लेकिन चुनावी परिणामों ने स्वंय ही आलोचकों को जवाब दे दिया है और जो पार्टी इतिहास में बनने वाली थी अब वह इतिहास बनाएगी। राजनीति के प्रकांड पंडित अब मंथन कर रहे हैं कि आखिर समाजवादी पार्टी ने जनता को किन मुद्दों पर अपनी ओर आकर्षित किया और सबसे बड़ी बात वो कौन से लोग हैं जिन्होंने समाजवाद को पैनी धार दी और पार्टी को स्पष्ट बहुमत के साथ भविष्य के राजनीतिक दल के रूप में खड़ा कर दिया।

वैचारिक तौर पर अखिलेश यादव यूपी की चुनावी महाभारत के अर्जुन साबित हुए जिन्होंने तमाम आशंकाओं को संभावनाओं में बदल कर विजय हासिल की लेकिन इस सब के बीच एक ऐसा शख्स भी पार्टी में मौजूद रहा जिसने समाजवाद को जीवित कर कार्यकर्ताओं को दूरदर्शिता दी, जिसने कार्यकर्ताओं को जीतने का मंत्र दिया। एक ऐसा शख्स जो कुछ ही समय में पार्टी की चुनावी रणनीति की धुरी बन गया। अपनी कुशाग्र बुद्धि और जमीन से जुडे व्यक्तित्व के कारण लोगों ने उसे और और पार्टी को अपना समझ कर वोट दिया।

वो शख्स है शाहिद सिद्धकी। हालांकि शाहिद सिद्धकी उत्तर प्रदेश के राजनीतिक हलकों में कोई नया नाम नहीं है क्योंकि अपनी स्पष्टवादी विचारों के कारण कई बार उन्होंने पार्टियों को अलविदा कहा लेकिन अपने जनसमर्थन और सख्त तेवरों के कारण पहचान बनाने वाले शाहिद के लिए हर पार्टी ने अपने दरवाजे खोल कर रखे। लेकिन वैचारिक मतभेद के कारण अधिकांश समय तक समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को ही उन्होंने अपनी कर्मस्थली बनया।

इस बार के उत्तर प्रदेश चुनाव में उन्होंने कोई जोखिम नहीं उठाया है। वह शायद इकलौते शख्स हैं जिन्होंने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान न केवल जन सभाएं की वरन टीवी चैनलों के पैनल डिस्कशन में समाजवादी पार्टी की विचारधारा को आमजन तक पहंचाया। आम जनता को उन्होंने अपनी वाक चपलता से यकीन दिलाया कि बहुजन समाज पार्टी ने सत्ता संभालते ही प्रदेश को क्या-क्या नुकसान पहुंचाया और अगर विधानसभा चुनावों में जनता बसपा, कांग्रेस और भाजपा को विकल्प बनाती है तो प्रदेश का भवियष्य क्या होगा?

सपा कार्यकर्ताओं का मानना था कि शाहिद जी की बदौलत पार्टी में एक चाणक्य का प्रादुभाव हो गया है। एक कार्यकर्ता के अनुसार, “पहले चुनावी कैम्पैनिंग की जाती थी लेकिन सही दिशा और दशा के अभाव में हमारी पहुंच आम जनता तक नहीं थी लेकिन अब शाहिद जी के नेतृत्व में अगर मध्यमवर्गीय जनता तक हमारा संदेश नहीं पहुंच पाता है तो शाहिद जी टीवी स्टूडियों में विपक्ष के सभी नेताओं को अपनी संप्रेषण क्षमता से चुप करा देते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उनके व्यक्तित्व में एक अजीव आकर्षण है लोग उन की कही बातों पर यकीन करते हैं। इसी का परिणाम है कि शायद ही ऐसा कोई टीवी चैनल बचा हो जिन पर शाहिद जी ने अपने और अपनी पार्टी के विचार न रखे हों।

उनकी सबसे बड़ी खासियत है कि वह बहुत अच्छे वक्ता और श्रोता हैं। यही वजह की उनके पास ज्ञान का अथाह भंडार है। वे देश के उन गिने चुने हुए राजनीतिज्ञों में शामिल हैं जो किसी भी विषय पर लंबे समय तक बोल सकते हैं। इतिहास पर गौर करें तो समाजवादी पार्टी के नेतृव्त में उन्होंने ही सर्वप्रथम मुस्लिम आरक्षण की मांग की थी। इसी का परिणाम है कि पिछड़ा मुसलमान उन्हें अपने सर्वमान्य नेता के रूप में मानता है।

उनकी माने तो, “देश के विकास के लिए मुसलमानों का विकास अतिआवश्यक है। आजादी के 60 साल बीत जाने के बावजूद देश के दूसरी सबसे बड़ी कौम बेहद विकट परीस्थितियों में है। अगर हम गौरवपूर्ण धर्मनिरपेक्ष देश की बात करते हैं तो हम ये कैसे भूल जाते हैं कि देश की एक विशेष कौम का बड़ा हिस्सा गुरवत में जी रहा है।"

हालांकि उन पर मुसलमानों के संदर्भ में राजनीति करने का इल्जाम लम्बे समय से लगता आ रहा है लेकिन उन्हें इस बात की कोई अफसोस नहीं हैं। एक पत्रकार द्वारा जब मुस्लिम तुष्टिकरण पर उन से सवाल पूछा गया तो उनका कहना था कि, “एक जरूरतमंद कौम की हक की बात करना कहां का तुष्तिकरण है? जब आरक्षण की मांग के लिए लोग रेलवे ट्रेक रोक लेते हैं, दिल्ली का पानी बंद कर देते हैं तब उनसे कोई कुछ नहीं कहता है लेकिन अगर देश का मुसलमान आरक्षण की मांग के लिए शांतीपूर्ण मांग करे तो वो भी हिंसा है।”

चुनाव परिणाम आने के बाद जब उनसे पूछा गया कि वे परिणामों के संबंध में क्या उम्मीद कर रहे थे, ऐसे में उनका जवाब था, “इससे भी बेहतर”। हालांकि कार्यकर्ताओं का मानना था कि विजय उत्सव के इस माहौल में शाहिद सिद्धकी चुनावी भागदौड़ के बाद आराम करेंगे। लेकिन जब उनसे पूछा गया तो जवाब बिल्कुल विपरीत था उनका कहना था कि, “काम तो अब शुरू हुआ है। जनता ने जिस उम्मीद से उन्हें और समाजवादी पार्टी को चुना है उसको साबित करने का समय आ गया है। हमें समाज के सबसे अंतिम छोड़ पर खड़े व्यक्ति को अहसास दिलाना है कि वह भी विकास कर रहा है और उसका भविष्य सही और मजबूत हाथों में है।”
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