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Published On:18 March 2011
Posted by Indian Muslim Observer

कांग्रेस के झंडे में शंकराचार्य का पंजा!

वाराणसी [एल.एन. त्रिपाठी]। कभी तिरंगे में चरखा, कभी दो बैलों की जोड़ी तो कभी गाय व बछड़ा। पिछले सवा सौ साल के इतिहास में कांग्रेस कई चुनाव चिन्ह देख चुकी है। इसमें सिर्फ पंजा ही ऐसा चुनाव निशान है जो सबसे लंबे समय से पार्टी के साथ है। यह अलग बात है कि इस धर्मनिरपेक्ष पार्टी का यह पंजा खासा धार्मिक है। यह कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य का पंजा है। पूर्व प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गंाधी के गर्दिश के दिनों में दिए गए इस आशीर्वाद ने उस समय न सिर्फ इंदिरा गांधी की सत्ता में वापसी कराई थी वरन कांग्रेस को फिर से खड़ा करने में भी अहम रोल निभाया था।

एनी बेसेंट के थियोसॉफिकल सोसायटी के सक्रिय सदस्यों एलन ऑक्टोवियन ह्युंम व अन्य द्वारा 1885 में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 1931 में तिरंगे को अपने पहले झंडे के रूप में स्वीकार किया था। आजादी के बाद तिरंगा राष्ट्रीय ध्वज बन गया। इसके बाद काफी दिनों तक दो बैलों की जोड़ी पार्टी का चुनाव चिह्न रहा। 1969 में पार्टी में विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने इस चिह्न को जब्त कर लिया। उस समय कामराज के नेतृत्व वाली पुरानी कांग्रेस को तिरंगे में चरखा जबकि नई कांग्रेस को गाय बछड़े का चुनाव चिह्न दिया गया। 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद का दौर कांग्रेस के लिए सर्वाधिक खराब समय रहा। पार्टी में कई धड़े हो गए। इसको देखते हुए चुनाव आयोग ने गाय बछड़े के चिह्न को भी जब्त कर लिया। इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश व रायबरेली में करारी हार के बाद सत्ता से बाहर हुई कांग्रेस के अलंबरदार काफी विचलित थे।

कांची कामकोटि मठ, वाराणसी के प्रबंधक वीएस सुब्रमण्यम मणिजी के अनुसार ऐसे समय में श्रीमती इंदिरा गांधी तत्कालीन शंकराचार्य स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती का आशीर्वाद लेने गई। वह काफी देर तक बात करती रहीं पर शंकराचार्य मौन रहे। उठने लगीं तो शंकराचार्य ने दाहिना हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया। श्रीमती गांधी ने तत्काल इसी हाथ [पंजा] को अपना चुनाव चिह्न बनाने का निर्णय लिया।

इस प्रसंग का आन्ध्र प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री एन भास्करराव ने भी अपनी जीवनी में बहुत विस्तार से उल्लेख किया है। उनके अनुसार यह 1978 की बात है। उस समय आन्ध्र समेत चार राज्यों का चुनाव चल रहा था। श्रीमती गांधी ने उस समय कांग्रेस-आई की स्थापना की थी और उन्हें चुनाव आयोग में अपना चुनाव चिह्न बताना था। आन्ध्र के दौरे पर गई श्रीमती गांधी ने शंकराचार्य से मिलने की इच्छा जताई थी। शंकराचार्य उस समय मदनपल्लै में थे। श्रीमती गांधी, भास्कर राव के साथ तत्काल मदनपल्लै गई। उन्होंने शंकराचार्य से आशीर्वाद मांगा साथ ही पार्टी सिंबल के लिए सुझाव भी। शंकराचार्य ने दाहिना हाथ हिलाया। श्रीमती गांधी ने इसे उनका इशारा मान कांग्रेस के झंडे में पंजे को शामिल करने का निर्देश दे दिया। यही बाद में कांग्रेस का चुनाव चिह्न बन गया।

खुद श्री राव ने इसे माना है कि यह एक ऐसा तथ्य है जिसकी जानकारी बहुत कम लोगों को है। जीवनी के अनुसार शंकराचार्य के इस आशीर्वाद के बाद कांग्रेस तुरंत पुनर्जीवित हो गई। उस समय हुए चार राज्यों के चुनाव में कांग्रेस की जोरदार जीत हुई साथ ही श्रीमती गांधी भी अपना चुनाव जीत गई। तत्कालीन सारे दिग्गजों को दरकिनार करते हुए यह कांग्रेस-आई ही बाद में मुख्य कांग्रेस पार्टी के रूप में स्थापित हुई। ज्ञात हो कि ब्रह्मलीन स्वामी चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती की 118वीं जन्म जयन्ती इस समय मनाई जा रही है। (Jagran)

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