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Published On:08 November 2010
Posted by Indian Muslim Observer

कश्मीर मामले में भारत सच्चाई का सामना करने से क्यों डरता है ?

सलमान अहमद 

इस में कोई शक नहीं के भारत एक शक्तिशाली देश बनकर उभर रहा है लेकिन ये भी एक सच्चाई है के एक शक्तिशाली मुल्क के अन्दर हकीकत को कुबूल करने की जो इच्छा शक्ति होनी चाहिए भारत उससे अभी कोसो दोर है । कश्मीर के मामले में भी हमारी यानि भारत की कुछ ऐसी ही पॉलिसी है के वोह कश्मीर की सच्चाई तो जनता है लेकिन उस सच्चाई का सामना करने से डरता है । अफ़सोस की बात ये है के हमारे देश यानि भारत का अक्सर मीडिया भी सच्चाई से आँखें चुराता है। सब से जियादा तकलीफ की बात ये है के जो कोई सच बोलने की की हिम्मत करता है उसपर देश दुरोही होने का इलज़ाम लगाया जाता है। मुझे भी डर लग रहा है के कहीं सच बोलने के जुर्म में देश दुरोही का इलज़ाम ना लग जाये, लेकिन किया करों सच बोले बगैर रहा भी नहीं जाता है इसलिए के झोट बोलकर ज़ख्म को छुपाने से कोई फ़ायदा नहीं होता बलके उलटा नुकसान होता है इसलिए हम चाहते है के ज़ख्म को छुपाने के बजाये उसका इलाज किया जाये ताके हमारी आने वाली नस्ल अमनो सुकों के साथ विकास और तरक्की के रस्ते पर चलती रहे।


आज मैं बात करने जारहा हूँ कश्मीर की, उस कश्मीर की बात जो न जाने कबसे सुलग रहा है। कब तक सुलगेगा, इसका क्या इलाज है।


इन सब सवालों पर लोगों और दलों के अलग-अलग विचार हो सकते हैं। लेकिन एक मुद्दे पर सबके विचार एक हैं, या कम से कम मुझे लगता है कि एक हैं – कि कश्मीरी अपनी इच्छा से भारत के साथ नहीं रहना चाहते। मैं यह नहीं कह रहा कि वे पाकिस्तान के साथ रहना चाहते हैं। मेरी समझ यह है, और सारे पोल भी यही कह रहे हैं कि वे अलग रहना चाहते हैं।

अभी कुछ महीने पहले लंदन के चैटम हाउस की तरफ से दोनों कश्मीरी भागों में एक ओपिनियन पोल कराया गया था। पोल का नतीजा यह था कि दोनों तरफ के कश्मीरी न तो भारत के साथ रहना चाहते थे न ही पाकिस्तान के साथ। ज्यादातर आज़ादी चाहते हैं। पोल के मुताबिक कश्मीरी घाटी में ऐसा चाहनेवालों की संख्या 74 से 95 प्रतिशत थी।

यह पोल 2010 में यानी इसी साल कराया गया था। इससे पहले 1995 में आउटलुक मैगज़ीन ने अपने पहले अंक में ही कश्मीरियों का मन जानने के लिए एक ओपिनियन पोल कराया था। उसका नतीज़ा भी यही था – 72 प्रतिशत कश्मीरी भारत के साथ नहीं रहना चाहते। यानी 15 सालों में कश्मीर के हालात वैसे ही हैं। आप उनका मन नहीं बदल पाए। सच तो यह है कि आपने कभी भी उनका मन जानने की कोशिश ही नहीं की। अगर जानने की कोशिश की होती तो आज वे हमारे साथ होते और बिना किसी शिकायत के होते।

1947 में भारत-पाक बंटवारा हुआ। तय यह था कि हिंदू-बहुल प्रांत भारत में और मुस्लिम-बहुल सूबे पाकिस्तान के हिस्से में जाएंगे। रजवाड़ों को यह आज़ादी दे दी गई थी कि वे चाहे भारत में मिलें, चाहे पाकिस्तान में या फिर स्वतंत्र रहें। जम्मू-कश्मीर रियासत के राजा हरि सिंह ने पहले पाकिस्तान से सौदेबाजी की कोशिश की लेकिन जो वह चाहते थे, वह सब उनको देने पर पाकिस्तानी हुकूमत राजी नहीं हुई। इस के बाद राजा हरि सिंह ने भारत से संपर्क किया। भारत ने मदद की हामी तो भरी लेकिन साथ यह शर्त जोड़ दी कि राजा हरि सिंह पहले जम्मू-कश्मीर के भारत के साथ विलय की संधि पर दस्तखत करें। इसके बाद राजा ने अक्सेशन ट्रीटी पर दस्तखत करके कश्मीर को भारत में मिलाने का करार किया।

इस सारे प्रोसेस में गड़बड़ यह थी कि जब सारा भारत-पाक बंटवारा ही सांप्रदायिक आधार पर हो रहा था, तब एक मुस्लिम-बहुल राज्य भारत के साथ मिलाया जा रहा है बिना इस बात की पड़ताल किए कि वहां के लोग क्या चाहते हैं। कोई भी तब यह निष्कर्ष निकाल सकता था कि कश्मीरी मुसलमान भारत के साथ नहीं रहना चाहते थे और एक हिंदू राजा ने अपने हित में अपनी रियासत को भारत से मिलाने का करार कर दिया। स्थिति इसलिए और भी जटिल थी कि हैदराबाद और जूनागढ़ के मामले में तब की भारत सरकार का स्टैंड बिल्कुल अलग था। हैदराबाद के निजाम और जूनागढ़ के नवाब अपने इलाकों को भारत के साथ नहीं मिलाना चाहते थे, लेकिन भारत सरकार ने उनकी एक नहीं चलने दी।

तब के प्रधानमंत्री नेहरू जानते थे कि कश्मीर के मामले में भारत का स्टैंड अंतरराष्ट्रीय मंच पर ठहर नहीं पाएगा क्योंकि कश्मीर में एक बात और हैदराबाद और जूनागढ़ में दूसरी बात नहीं चल सकती। नेहरू कभी भी इस बात को नहीं मान सकते थे कि कोई राज्य सिर्फ इसलिए भारत के साथ रहे कि उसका राजा यह चाहता है। इसीलिए उन्होंने यूएनओ को भरोसा दिलाया कि हम कश्मीरियों से जबरदस्ती नहीं कर रहे और हम जल्द से जल्द उनकी इच्छा जानने के लिए जनमतसंग्रह करेंगे। लेकिन बाद में यह मामला उलझ गया क्योंकि पाकिस्तान की मांग थी कि जनमतसंग्रह यूएन की देखरेख में हो और जनमतसंग्रह से पहले पूरे इलाके से बाहरी फौजें जिनमें भारतीय फौजें भी शामिल थीं पूरी तरह से हटाई जाएं। भारत इसके लिए तैयार नहीं था। मामला वहीं लटका रहा। इस बीच काफी घटनाएं हुईं। 1952 में शेख अब्दुल्ला के साथ दिल्ली अग्रीमेंट साइन हुआ लेकिन एक साल बाद वही शेख अब्दुल्ला गिरफ्तार कर लिए गए। शेख के जेल में रहते-रहते 1954 में कश्मीर की संविधान सभा से भारत के साथ मर्जर का अनुमोदन करवा दिया गया और भारत की तरफ से जनमतसंग्रह का मामला हमेशा-हमेशा के लिए खत्म हो गया।

लेकिन इससे नुकसान यह हुआ कि पाकिस्तान को यह मुद्दा भी हमेशा-हमेशा के लिए मिल गया कि कश्मीरियों से तो आपने कभी पूछा ही नहीं। वह हर अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह मुद्दा उठाता रहता है और हमारे पास बगलें झांकने और यह रटा-रटाया वाक्य बोलने के अलावा कोई रास्ता ही नहीं है कि जम्मू-कश्मीर भारत का एक अभिन्न हिस्सा है। लेकिन इस वाक्य का तब कोई मतलब नहीं रह जाता जब कोई देश हमसे पलटकर यह पूछ बैठता है - अगर जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है तो क्या 1971 में पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) पाकिस्तान का अभिन्न अंग नहीं था? उसकी आज़ादी में आपने क्यों मदद की?


मेरी ये बातें बहुत सारे लोगों को सख्त ज़रोर लग रही होंगी और कुछ लोगों के गले से नीचे भी नहीं उतर रही होंगी लेकिन सच्चाई को हर हाल में कुबूल करनी चहिये चाहे वोह कितनी ही कडवी क्यिओं ना हो, जो लोग सच्चाई को अपनी मर्ज़ी से कुबूल नहीं करते उन्हें वक़्त और हालात कुबूल करने के लिए मजबूर कर देते हैं ।


रखियो ग़ालिब मुझे इस तल्ख़ नवाई से मुआफ /
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सवा होता है /


(Email: salmanahmed70@yahoo.co.in)

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1 comments for "कश्मीर मामले में भारत सच्चाई का सामना करने से क्यों डरता है ?"

  1. This is the fact, nobody want to accept this reality....and nobody wants to find out the truth behind the pain....who has lost everything after independence...

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